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नज़्म
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगा
सुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये कस दयार-ए-अदम में मुक़ीम हैं हम तुम
जहाँ पे मुज़्दा-ए-दीदार-ए-हुस्न-ए-यार तो क्या
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
फीका है जिस के सामने अक्स-ए-जमाल-ए-यार
अज़्म-ए-जवाँ को मैं ने वो ग़ाज़ा अता किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
आख़िरी हिचकी में दीदार-ए-सनम हो तो कहीं नज़्म बने
उजड़े आँगन के अहाते में तेरी आमद हो
उमैननुज़ ज़हरा सय्यद
नज़्म
रोज़-ओ-शब मुंतज़िर-ए-दीद-ए-रुख़-ए-यार हूँ मैं
दिल है वक़्फ़-ए-ग़म-ए-आलाम कहाँ है आ जा
शकील बदायूनी
नज़्म
ख़ुश हूँ फ़िराक़-ए-क़ामत-ओ-रुख़्सार-ए-यार से
सर्व-ओ-गुल-ओ-समन से नज़र को सताएँ हम