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नज़्म
माथे से नुमूदार हो कर अपने होने का एहसास दिलाएँ गे
इस आज़ाद मुल्क में जहाँ ग़ुलामी के तौक़ पहने
सिदरा अफ़ज़ल
नज़्म
देख मिरी जाँ कह गए बाहू कौन दिलों की जाने 'हू'
बस्ती बस्ती सहरा सहरा लाखों करें दिवाने 'हू'