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नज़्म
हुस्न का आग़ोश-ए-रंगीं दिल-फ़रेब-ओ-दिलरुबा
इल्म से बन जाए अक़्लीदस का महज़ इक दायरा!
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मुर्ग़ान-ए-बाग़ बन कर उड़ते फिरें हवा में
नग़्मे हों रूह-अफ़्ज़ा और दिल-रुबा सदाएँ
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
फ़िक्र-ए-गुनहगारी का ताज़ा दिल-रुबा पैग़ाम था
तेरे ही कूचे में ये सब अहद-ए-वफ़ा तोड़े गए
अली जवाद ज़ैदी
नज़्म
दिलरुबा तेरी अदाएँ ख़ुश-नज़र तेरा जमाल
रौशनी देता है ज़ेहनों को तिरा महर-ए-ख़याल
मोअज़्ज़म अली खां
नज़्म
यूँ गँवा न ऐ मिरी दिल-रुबा ये जो चार दिन का शबाब है
ये झुकी-झुकी सी नज़र सनम ये सवाल है कि जवाब है
सदा अम्बालवी
नज़्म
दमकते चेहरे घनेरी ज़ुल्फ़ें
ये सरसराते हवाओं जैसे लिबास जिस्मों का बाँकपन दिलरुबा अदाएँ