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नज़्म
मैं ने ग़ल्ले को गोदामों में छुपाया है कभी
मैं ने डॉलर के लिए हाथ बढ़ाया है कभी
इज़हार मलीहाबादी
नज़्म
ज़ईम रशीद
नज़्म
मुल्क भर को क़ैद कर दे किस के बस की बात है
ख़ैर से सब हैं कोई दो-चार दस की बात है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मेरे आलम में नहीं इस बद-मज़ाक़ी का शिआर
काकुल-ए-अफ़्साना हो दोश-ए-हक़ीक़त से दो-चार
जोश मलीहाबादी
नज़्म
अगर बजा है तो 'बिस्मिल' की अर्ज़ भी सुन लो
चमन है सामने दो-चार फूल तुम चुन लो
बिस्मिल इलाहाबादी
नज़्म
कुलबुलाती बस्तियाँ मुश्किल से दो-चार आदमी
कितना कमयाब आदमी है कितना बिसयार आदमी