aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "dolte"
जब फ़स्ल कटी तो क्या देखाकुछ दर्द के टूटे गजरे थेकुछ ज़ख़्मी ख़्वाब थे काँटों परकुछ ख़ाकिस्तर से कजरे थेऔर दूर उफ़ुक़ के सागर मेंकुछ डोलते डूबते बजरे थे
सब माल निकालो, ले आओऐ बस्ती वालो ले आओये तन का झूटा जादू भीये मन की झूटी ख़ुश्बू भीये ताल बनाते आँसू भीये जाल बिछाते गेसू भीये लर्ज़िश डोलते सीने कीपर सच नहीं बोलते सीने कीये होंट भी, हम से क्या चोरीक्या सच-मुच झूटे हैं गोरी?इन रम्ज़ों में इन घातों मेंइन वादों में इन बातों मेंकुछ खोट हक़ीक़त का तो नहीं?कुछ मैल सदाक़त का तो नहीं?ये सारे धोके ले आओये प्यारे धोके ले आओक्यूँ रक्खो ख़ुद से दूर हमेंजो दाम कहो मंज़ूर हमें
मुहीब फाटकों के डोलते किवाड़ चीख़ उठेउबल पड़े उलझते बाज़ुओं चटख़ती पिस्लियों के पुर-हिरास क़ाफ़िलेगिरे बढ़े मुड़े भँवर हुजूम के
खिलाड़ियों के ख़ुद-नविश्त दस्तख़त के वास्ते किताबचे लिए हुएखड़ी हैं मुंतज़िर हसीन लड़कियाँढलकते आँचलों से बे-ख़बर हसीन लड़कियाँमुहीब फाटकों के डोलते क्वार्टर चीख़ उठेउबल पड़े उलझते बाज़ुओं चटख़ती पसलियों के पुर-हिरास क़ाफ़िलेगिरे बढ़े मुड़े भँवर हुजूम केखड़ी हैं ये भी रास्ते पे इक तरफ़ बयाज़-ए-आरज़ू-ब-कफ़नज़र नज़र में ना-रसा परस्तिशों की दास्ताँलरज़ रहा है दम-ब-दम कमान आबरुओं का ख़मकोई जब एक नाज़-ए-बे-नियाज़ से किताबचों पे खींचता चला गयाहुरूफ़-ए-कज-तराश की लकीर सीतो थम गईं लबों पे मुस्कुराहटें शरीर सीकिसी अज़ीम शख़्सियत की तमकनतहिनाई उँगलियों पे काँपते वरक़ पे झुक गईतो ज़र-निगार पल्लुओं से झाँकती कलाइयों की तेज़ नब्ज़ रुक गईवो बॉलर एक महवशों के जमघटे में घिर गया वो सफ़्हा-ए-बयाज़ परब-सद ग़ुरूर किल्क-ए-गौहरीं फिरेंहसीन झिलमिलाहटों के दरमियाँ विकट गिरीमैं अजनबी मैं बे-निशाँ मैं पा-ब-गिलन रिफ़अत-ए-मक़ाम है न शोहरत-ए-दवाम है ये लौह-ए-दिल पे लौह-ए-दिलन उस पे कोई नक़्श है न उस पे कोई नाम है
कल शब अजीब अदा से था इक हुस्न मेहरबाँवो शबनमी गुलाब सी रंगत धुली धुलीशानों पे बे-क़रार वो ज़ुल्फ़ें खुली खुलीहर खत्त-ए-जिस्म पैरहन-ए-चुस्त से अयाँठहरे भी गर निगाह तो ठहरे कहाँ कहाँहर ज़ाविए में हुस्न का इक ताज़ा बाँकपनहर दाएरे में खिलते हुए फूल की फबनआँखों में डोलते हुए नश्शे की कैफ़ियतरू-ए-हसीं पे एक शिकस्ता सी तमकनतहोंटों पे अन-कही सी तमन्ना की लरज़िशेंबाँहों में लम्हा लम्हा सिमटने की काविशेंसीने के जज़्र-ओ-मद में समुंदर सा इज़्तिराबउमडा हुआ सा जज़्बा-ए-बेदार का अज़ाबख़ुश्बू तवाफ़-ए-क़ामत-ए-ज़ेबा किए हुएशीशा बदन का अज़्म-ए-ज़ुलेख़ा लिए हुएफिर यूँ हुआ कि छिड़ गई यूसुफ़ की दास्ताँफिर मैं था और पाकीए-दामन का इम्तिहाँइक साँप भी था आदम ओ हव्वा के दरमियाँ
जब उस ने हाथ से धरती दबा केकोहनियों की आज़माइश कीकि शायद इस तरह वो उठ सकेतो सिर्फ़ अपने सर को गर्दन का सहारा दे सकाबालों की लम्बी एक लटमाथे पे मुतवाज़ी खुदी शिकनों मेंछुप कर काँपती थीऔर कुछ बालों को ताज़ा चोट रंगीं कर गई थीतहय्युर बेबसी के साथआँखों की नमी में जज़्ब हो करआहनी चश्मे केशीशों में लरज़ता थाखुले होंटों में दाँतों के शिगाफ़ों कोज़बाँ पैवंद करती थीदहन के नम किनारेकान के बुनसुर्ख़ रुख़्सारों के बलचाह-ए-ज़क़न के मुँह से लटकेतह-ब-तह गर्दन के सिलवटऔर उन में डोलते पानी के क़तरेसब के सब हिलते थेबस रफ़्तार में इक दूसरे से मुख़्तलिफ़ थे
मैं और मेरी हयातयूँ तो दोनों साथ साथ चलते हैंफिर भी हम-कलाम नहीं होतेजैसे एक दूसरे से ना-आश्नाया फिर दोनों की ज़बानें जुदा जुदाहालात की कश्ती में डोलते जाते हैंअंजाम से बे-ख़बर ख़तरात से बे-ख़तरआबला जिस के फूटने का इंतिज़ारएक ख़ार एक कली का मुहताजसाल के बारह महीने हफ़्ते के सात दिनसुब्ह शाम उन में फँसा हुआ मैंयही इब्तिदा यही इंतिहाबस साँस का भत्ता चलता हैदिन लोहे की मानिंद पिघलता हैऔर मैं भीलावा बन कर एक दिनइन साल के बारह महीनोंहफ़्ते के साथ दिनों में कभीबह जाऊँगा
धुँद के रिश्ते गहरे होते जाते हैंआवाज़ नहीं जो आएऔर कानों की बेकार हवस परजलते पानी के छींटे देसोच सको तो सोचोऔर इस डोलते पल की राख परअपने उल्टे सीधे नाम लिखोशंकर दुर्गा विद्या विजय सुमित्राजो अब भी है वो कभी न थाजो कभी न था वो अब भी हैवो अब भी है और तुम उस को पहचानते होजब धुँद का झूटतुम्हारे सर पर नाचेगातुम रोओगेकिसी को इस के न होने का दोश न दोवो कौन थाअपने बरसों के भूले बिसरे ईमान की लज्जाभीगी मिट्टी में बंद किएइस दुखी ज़मीन पे हार गयापहचानते होशायदशायद तो फिर जाने दोबुरे भले तो पेट की काली तह में होते हैंऔर मटियाली उलझनऔर जिस्म पे कितनी सर्द लकीरेंखींची जाती हैंकोई नहीं जोरू केकोई नहीं जोरू केअभिलाशा कब पैदा होती हैकितनी घड़ियाँ रोज़ बढ़ाती हैकितनी घड़ियाँ रोज़ घटाती हैकब जागती है कब सोती हैअभिलाशा दुर्गा हैऔर दुर्गा डीज़ल पीना सीख गई हैउस ने दूधिया कपड़े और सुनहरे गहनेउतार दिए हैंखिलौने अब भी मिल जाते हैंपर धरती अनाज से ख़ाली हैऔर जेब में ख़ाक भरी हैख़ाक छुपा कर चलना मुश्किल हैजब सड़कें जाती होंजब धूप और कूड़े के धब्बेरफ़्तार घुलावट छोटे बड़े अज्दादसमय के उड़ते ज़र्रों काबे-ज़मीर भी जाग उठेतो जेब की तह मेंख़ाक छुपा के चलना मुश्किल हैशोर ही शोर और गूँगे पाँवताज़ा अख़बार के टुकड़े दुनियादरवाज़े बंद करोनन्हे विजय से कह दो वो सो जाएदूरी सिर्फ़ सिसकती दूरी हैवो कभी नहीं भुलाएगीदरवाज़ा बंद करो और चुप हो जाओधुँद के रिश्ते गहरे होते जाते हैं
यहाँ से जो देखो तो जैसे... कहीं हद्द-ए-इम्काँ तलकगुम-शुदा वक़्त जैसी अँधेरी गुफा हैयहाँ से जो देखो... तोउम्मीद जैसा बहुत हैरत-अफ़ज़ा... अजब सिलसिला हैजो इस तंग, तारीक नुक़्ते सेमुमकिन के मानिंद, इक रौशनी-ज़ाद क़र्ये की जानिब खुला हैफ़ज़ा में कहीं नील-गूँ सब्ज़, हल्के सुनहरेकहीं बस हरे ही हरे... सख़्त गहरेबहुत ऊँघते डोलते रंगसूखे हुए सुर्ख़ पत्तों के मानिंदउस बे-अमाँ रास्ते पर पड़े हैं
गली के सुर्ख़ मोड़ परकनार-ए-शाम नुक़रई लिबास में जमालती हुई शरीर अप्सरा नहीं रहीवो रीश में गुँधे हुएबदन का ख़म ज़मीन पर उतारते हुए ज़ईफ़ लाठियों पे डोलतेख़मीदा सर नहीं रहेवो टायरों से खेलता ग़ुबार उड़ाता बचपनावो साँवले हिजाब में सफ़ेद मुस्कुराहटेंहया की सब्ज़ कतरनें कि जिन पे सुर्ख़ मोतियों का नीलगूँ लिहाफ़ थान-जाने कौन सम्त हैं
ख़ौफ़ अभी जुड़ा न था सिलसिला-ए-कलाम सेहर्फ़ अभी बुझे न थे दहशत-ए-कम-ख़िराम सेसंग-ए-मलाल के लिए दिल आस्ताँ हुआ न थाइक़्लीम-ए-ख़्वाब में कहीं कोई ज़ियाँ हुआ न थानिकहत-ए-अब्र-ओ-बाद की मस्ती में डोलते थे घरसाफ़ दिखाई देते थेउस की गली के सब शजरगर्द मिसाल-ए-दस्तकें दर पे अभी जमी न थींरंग-ए-फ़िराक़-ओ-वस्ल की परतें अभी खुली न थींऐसे में थी किसे ख़बरजब साअत-ए-माहताब होयूँ भी तो है कि और ही नक़्शा-ए-ख़ाक-ओ-आब हो
न तन्हाई ये सन्नाटा ये आँसूतमन्नाओं की शम्ओं' की क़तारेंदिलों के ज़ख़्म यादों के जनाज़ेदहकते फूल कजलाई बहारेंख़ला में डोलते हैं दुख के साएकोई अपना नहीं किस को पुकारेंदिल-ए-वीराँ का इक परतव है जिस नेजहाँ में शाम-ए-ग़म का नाम पायाकभी जो दर्द की शिद्दत से चीख़ेतो दुनिया ने उसे इक गीत समझाउन्हीं चीख़ों में ढाला मैं ने तुझ कोउन्हीं चीख़ों में तुझ को मैं ने पायाथिरकती रौशनी की चंद लहरेंबहकती चाँदनी में एक साया
तुम बिल्कुल हम जैसे निकलेअब तक कहाँ छुपे थे भाईवो मूरखता वो घामड़-पनजिस में हम ने सदी गँवाईआख़िर पहुँची द्वार तुहारेअरे बधाई बहुत बधाईप्रेत धर्म का नाच रहा हैक़ाएम हिन्दू राज करोगेसारे उल्टे काज करोगेअपना चमन ताराज करोगेतुम भी बैठे करोगे सोचापूरी है वैसी तय्यारीकौन है हिन्दू कौन नहीं हैतुम भी करोगे फ़तवा जारीहोगा कठिन यहाँ भी जीनादाँतों आ जाएगा पसीनाजैसी-तैसी कटा करेगीयहाँ भी सब की साँस घुटेगीभाड़ में जाए शिक्षा-विक्षाअब जाहिल-पन के गन गानाआगे गढ़ा है ये मत देखोवापस लाओ गया ज़मानामश्क़ करो तुम आ जाएगाउल्टे पाँव चलते जानाध्यान न दूजा मन में आएबस पीछे ही नज़र जमानाएक जाप सा करते जाओबारम-बार यही दोहराओकैसा वीर महान था भारतकितना 'आली-शान था भारतफिर तुम लोग पहुँच जाओगेबस परलोक पहुँच जाओगेहम तो हैं पहले से वहाँ परतुम भी समय निकालते रहनाअब जिस नर्क में जाओ वहाँ सेचिट्ठी-विट्ठी डालते रहना
यज़ीद नक़्शा-ए-जौर-ओ-जफ़ा बनाता हैहुसैन उस में ख़त-ए-कर्बला बनाता हैयज़ीद मौसम-ए-इस्याँ का ला-'इलाज मरज़हुसैन ख़ाक से ख़ाक-ए-शिफ़ा बनाता हैयज़ीद काख़-ए-कसाफ़त की डोलती बुनियादहुसैन हुस्न की हैरत-सरा बनाता हैयज़ीद तेज़ हवाओं से जोड़ तोड़ में गुमहुसैन सर पे बहन के रिदा बनाता हैयज़ीद लिखता है तारीकियों को ख़त दिन भरहुसैन शाम से पहले दिया बनाता हैयज़ीद आज भी बनते हैं लोग कोशिश सेहुसैन ख़ुद नहीं बनता ख़ुदा बनाता है
बे-सबब तो न थीं तिरी यादेंतेरी यादों से क्या नहीं सीखाज़ब्त का हौसला बढ़ा लेनाआँसुओं को कहीं छुपा लेनाकाँपती डोलती सदाओं कोचुप की चादर से ढाँप कर रखनाबे-सबब भी कभी कभी हँसनाजब भी हो बात कोई तल्ख़ी कीमौज़ू-ए-गुफ़्तुगू बदल देनाबे-सबब तो नहीं तिरी यादेंतेरी यादों से क्या नहीं सीखा
बहुत से काम हैंलिपटी हुई धरती को फैला देंदरख़्तों को उगाएँडालियों पे फूल महका देंपहाड़ों को क़रीने से लगाएँचाँद लटकाएँख़लाओं के सरों पे नील-गूँ आकाशफैलाएँसितारों को करें रौशनहवाओं को गती दे देंफुदकते पत्थरों को पँख दे कर नग़्मगी दे देंलबों को मुस्कुराहटअँखड़ियों को रौशनी दे देंसड़क पर डोलती परछाइयों कोज़िंदगी दे दें
लाख पर्दों में रहूँ भेद मिरे खोलती हैशाइ'री सच बोलती हैमैं ने देखा है कि जब मिरी ज़बाँ डोलती हैशाइ'री सच बोलती हैतेरा इसरार कि चाहत मिरी बेताब न होवाक़िफ़ इस ग़म से मिरा हल्क़ा-ए-अहबाब न होतो मुझे ज़ब्त के सहराओं में क्यूँ रोलती हैशाइ'री सच बोलती हैये भी क्या बात कि छुप छुप के तुझे प्यार करूँगर कोई पूछ ही बैठे तो मैं इंकार करूँजब किसी बात को दुनिया की नज़र तौलती हैशाइ'री सच बोलती हैमैं ने इस फ़िक्र में काटें कई रातें कई दिनमिरे शे'रों में तिरा नाम न आए लेकिनजब तिरी साँस मिरी साँस में रस घोलती हैशाइ'री सच बोलती हैतेरे जल्वों का है पर तिरी मिरी एक एक ग़ज़लतो मिरे जिस्म का साया है तो कतरा के न चलपर्दा-दारी तो ख़ुद अपना ही भरम खोलती हैशाइ'री सच बोलती है
वो उस का आख़िरी बोसाजो इस नफ़रत-भरी दुनिया मेंइक ख़ुश्बू का झोंका थाबिखरती पत्तियों में मौसम-ए-गुल के इशारे की तरहइक डोलती ख़ुश्बू का झोंकामैं जिसे इस हब्स के काले क़फ़स की तीलियों से मुस्कुराता देख सकता हूँ
ऐ मजाज़ ऐ तराना-बार मजाज़ज़िंदा पैग़म्बर-ए-बहार मजाज़ऐ बरू-ए-समन-विशाँ गुल-पोशऐ ब कू-ए-मुग़ाँ तमाम ख़रोशऐ परस्तार-ए-मह-रुख़ान-ए-जहाँऐ कमाँ-दार-ए-शाइरान-ए-जवाँतुझ से ताबाँ जबीन-ए-मुस्तक़बिलऐ मिरे सीना-ए-उमीद के दिलऐ मजाज़ ऐ मुबस्सिर-ए-ख़द-ओ-ख़ालऐ शुऊर-ए-जमाल ओ शम-ए-ख़यालऐ सुरय्या-फ़रेब ओ ज़ोहरा-नवाज़शाइर-ए-मस्त ओ रिंद-ए-शाहिद-बाज़नाक़िद-ए-इश्वा-ए-शबाब है तूसुब्ह-ए-फ़र्दा का आफ़्ताब है तूतुझ को आया हूँ आज समझानेहैफ़ है तू अगर बुरा मानेख़ुद को ग़र्क़-ए-शराब-ए-नाब न करदेख अपने को यूँ ख़राब न करशाइरी को तिरी ज़रूरत हैदौर-ए-फ़र्दा की तू अमानत हैसिर्फ़ तेरी भलाई को ऐ जाँबन के आया हूँ नासेह-ए-नादाँएक ठहराव इक तकान है तूदेख किस दर्जा धान-पान है तूनंग है महज़ उस्तुख़्वाँ होनासख़्त इहानत है ना-तवाँ होनाउस्तुख़्वानी बदन दुख़ानी पोस्तएक संगीन जुर्म है ऐ दोस्तशर्म की बात है वजूद-ए-सक़ीमना-तवानी है इक गुनाह-ए-अज़ीमजिस्म और इल्म तुर्फ़ा ताक़त हैयही इंसान की नबुव्वत हैजो ज़ईफ़-ओ-अलील होता हैइश्क़ में भी ज़लील होता हैहर हुनर को जो एक दौलत हैइल्म और जिस्म की ज़रूरत हैकसरत-ए-बादा रंग लाती हैआदमी को लहू रुलाती हैख़ुश-दिलों को रुला के हँसती हैशम-ए-अख़्तर बुझा के हँसती हैऔर जब आफ़त जिगर पे लाती हैरिंद को मौलवी बनाती हैमय से होता है मक़्सद-ए-दिल फ़ौतमय है बुनियाद-ए-मौलविय्यत-ओ-मौतकान में सुन ये बात है नश्तरमौलविय्यत है मौत से बद-तरइस से होता है कार-ए-उम्र तमामइस से होता है अक़्ल को सरसामइस में इंसाँ की जान जाती हैइस में शाइर की आन जाती हैये ज़मीन आसमान क्या शय हैआन जाए तो जान क्या शय हैगौहर-ए-शाह-वार चुन प्यारेमुझ से इक गुर की बात सुन प्यारेग़म तो बनता है चार दिन में नशातशादमानी से रह बहुत मोहतातग़म के मारे तो जी रहे हैं हज़ारनहीं बचते हैं ऐश के बीमारआन में दिल के पार होती हैपंखुड़ी में वो धार होती हैजू-ए-इशरत में ग़म के धारे हैंयख़-ओ-शबनम में भी शरारे हैंहाँ सँभल कर लताफ़तों को बरतटूट जाए कहीं न कोई परतदेख कर शीशा-ए-नशात उठाये वरक़ है वरक़ है सोने काकाग़ज़-ए-बाद ये नगीना हैबल्कि ऐ दोस्त आबगीना हैसाग़र-ए-शबनम-ए-ख़ुश-आब है येआबगीना नहीं हबाब है येरोक ले साँस जो क़रीब आएठेस उस को कहीं न लग जाएतेग़-ए-मस्ती को एहतियात से छूवर्ना टपकेगा उँगलियों से लहूमस्तियों में है ताब-ए-जल्वा-ए-माहऔर सियह मस्तियाँ ख़ुदा की पनाहख़ूब है एक हद पे क़ाएम नशाहल्का फुल्का सुबुक मुलाएम नशाहाँ अदब से उठा अदब से जामताकि आब-ए-हलाल हो न हरामजाम पर जाम जो चढ़ाते हैंऊँट की तरह बिलबिलाते हैंज़िंदगी की हवस में मरते हैंमय को रुस्वा-ए-दहर करते हैंयाद है जब 'जिगर' चढ़ाते थेक्या अलिफ़ हो के हिन-हिनाते थेमेरी गर्दन में भर के चंद आहेंपाँव से डालते थे वो बाँहेंअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीउफ़ घटा-टोप नश्शे का तूफ़ानभूत इफ़रीत देव जिन शैतानलात घूँसा छड़ी छुरी चाक़ूलिब-लिबाहट लुआब कफ़ बदबूतंज़ आवाज़ा बरहमी इफ़्सादता'न तशनीअ' मज़हका ईरादशोर हू-हक़ अबे-तबे है हैऔखियाँ गालियाँ धमाके क़यमस-मसाहट ग़शी तपिश चक्करसोज़ सैलाब सनसनी सरसरचल-चख़े चीख़ चुनाँ-चुनीं चिंघाड़चख़-चख़े चाऊँ चाऊँ चील-चिलहाड़लप्पा-डुक्की लताम लाम लड़ाईहौल हैजान हाँक हाथा-पाईखलबली कावँ कावँ खट-मंडलहौंक हंगामा हमहमा हलचलउलझन आवारगी उधम ऐंठनभौंक भौं भौं भिऩन भिऩन भन-भनधौल-धप्पा धकड़-पकड़ धुत्कारतहलका तू तड़ाक़ तुफ़ तकरारबू भभक भय बिकस बरर भौंचालदबदबे दंदनाहटें धम्मालगाह नर्मी ओ लुत्फ़ ओ मेहर ओ सलामगाह तल्ख़ी ओ तुरशी ओ दुश्नामअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीसिर्फ़ नश्शे की भीगने दे मसेंइन को बनने न दे कभी मूँछेंअल-अमाँ ख़ौफ़नाक काला नशाओह रीश-ओ-बुरूत वाला नशाअज़दर-ए-मर्ग ओ देव-ए-ख़ूँ-ख़्वारीअल-अमाँ नश्शा-ए-''जटाधारी''नश्शे का झुट-पुटा है नूर-ए-हयातझुटपुटे को बना न काली रातनश्शे की तेज़ रौशनी भी ग़लतचौदहवीं की सी चाँदनी भी ग़लतज़ेहन-ए-इंसाँ को बख़्शता है जमालनश्शा हो जब ये क़द्र-ए-नूर-ए-हिलालग़ुर्फ़ा-ए-अक़्ल भेड़ तो अक्सरपर उसे कच-कचा के बंद न कररात को लुत्फ़-ए-जाम है प्यारेदिन का पीना हराम है प्यारेदिन है इफ़रीत-ए-आज़ की खनकाररात पाज़ेब नाज़ुकी झंकारदिन है ख़ाशाक ख़ाक धूल धुआँरात आईना अंजुमन अफ़्शाँदिन मुसल्लह दवाँ कमर बस्तारात ताक़-ओ-रवाक़-ओ-गुल-दस्तादिन है फ़ौलाद-ए-संग तेग़-ए-अलमरात कम-ख़्वाब पंखुड़ी शबनमदिन है शेवन दुहाइयाँ दुखड़ेरात मस्त अँखड़ियाँ जवाँ मुखड़ेदिन कड़ी धूप की बद-आहंगीरात पिछले पहर की सारंगीदिन बहादुर का बान बीर की रथरात चंपाकली अँगूठी नथदिन है तूफ़ान-ए-जुम्बिश-ओ-रफ़्ताररात मीज़ान-ए-काकुल-ओ-रुख़्सारआफ़्ताब-ओ-शराब हैं बैरीबोतलें दिन को हैं पछल पैरीकर न पामाल हुर्मत-ए-औक़ातरात को दिन बना न दिन को रातपी मगर सिर्फ़ शाम के हंगामऔर वो भी ब-क़द्र-ए-यक-दो जामवही इंसाँ है ख़ुर्रम-ओ-ख़ुरसंदजो है मिक़दार ओ वक़्त का पाबंदमेरे पीने ही पर न जा मिरी जाँमुझ से जीना भी सीख हैं क़ुर्बांउस के पीने में रंग आता हैजिस को जीने का ढंग आता हैये नसाएह बहुत हैं बेश-बहाजल्द सो जल्द जाग जल्द नहाबाग़ में जा तुलूअ' से पहलेता निगार-ए-सहर से दिल बहलेसर्व-ओ-शमशाद को गले से लगाहर चमन-ज़ाद को गले से लगामुँह अँधेरे फ़ज़ा-ए-गुलशन देखसाहिल ओ सब्ज़ा-ज़ार ओ सौसन देखगाह आवारा अब्र-पारे देखइन की रफ़्तार में सितारे देखजैसे कोहरे में ताब-रु-ए-निकूजैसे जंगल में रात को जुगनूगुल का मुँह चूम इक तरन्नुम सेनहर को गुदगुदा तबस्सुम सेजिस्म को कर अरक़ से नम-आलूदताकि शबनम पढ़े लहक के दरूदफेंक संजीदगी का सर से बारनाच उछल दंदना छलांगें मारदेख आब-ए-रवाँ का आईनादौड़ साहिल पे तान कर सीनामस्त चिड़ियों का चहचहाना सुनमौज-ए-नौ-मश्क़ का तराना सुनबोस्ताँ में सबा का चलना देखसब्ज़ा ओ सर्व का मचलना देखशबनम-आलूद कर सुख़न का लिबासचख धुँदलके में बू-ए-गुल की मिठासशाइरी को खिला हवा-ए-सहरइस का नफ़क़ा है तेरी गर्दन पररक़्स की लहर में हो गुम लब-ए-नहरयूँ अदा कर उरूस-ए-शेर का महरजज़्ब कर बोस्ताँ के नक़्श-ओ-निगारज़ेहन में खोल मिस्र का बाज़ारनर्म झोंकों का आब-ए-हैवाँ पीबू-ए-गुल रंग-ए-शबनमिस्ताँ पीगुन-गुना कर नज़र उठा कर पीसुब्ह का शीर दग़दग़ा कर पीताकि मुजरे को आएँ कुल बर्कातदौलत जिस्म ओ इल्म ओ अक़्ल ओ हयातये न ता'ना न ये उलहना हैएक नुक्ता बस और कहना हैग़ैबत-ए-नूर हो कि कसरत-ए-नूरज़ुल्मत-ए-ताम हो कि शो'ला-ए-तूरएक सा है वबाल दोनों कातीरगी है मआ'ल दोनों कादर्खुर-ए-साहब-ए-मआ'ल नहींहर वो शय जिस में ए'तिदाल नहींशादमानी से पी नहीं सकताजिस को हौका हो जी नहीं सकताऐ पिसर ऐ बरादर ऐ हमराज़बन न इस तरह दूर की आवाज़कोई बीमार तन नहीं सकताख़ादिम-ए-ख़ल्क़ बन नहीं सकताख़िदमत-ए-ख़ल्क़ फ़र्ज़ है तुझ परदौर-ए-माज़ी का क़र्ज़ है तुझ परअस्र-ए-हाज़िर के शाइर-ए-ख़ुद्दारक़र्ज़-दारी की मौत से होश्यारज़ेहन-ए-इंसानियत उभार के जाज़िंदगानी का क़र्ज़ उतार के जातुझ पे हिन्दोस्तान नाज़ करेउम्र तेरी ख़ुदा दराज़ करे
किनारे पर कोई आया था जिस का ख़ाली बजरा डोलता रहता है पानी परकोई उतरा था बजरे सेवो माँझी होगा जिस के पाँव के मद्धम निशाँ अब तक दिखाई दे रहे हैं गीले साहिल परगया था कहकशाँ के पार ये कह करअभी आता हूँ ठहरो उस किनारे पर ज़रा मैं देख लूँ क्या हैये बजरा डोलता रहता है इस ठहरे हुए दरिया के पानी परवो लौटेगा या मैं जाऊँमुझे उस पार जाना है
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