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नज़्म
कुछ औरतें चली आई हैं ज़िंदगी-भर मुझे करते हुए मुआ'फ़
उन का हमेशा रहता हूँ शुक्र-गुज़ार
सुधांशु फ़िरदौस
नज़्म
ख़ुदा अलीगढ़ के मदरसे को तमाम अमराज़ से शिफ़ा दे
भरे हुए हैं रईस-ज़ादे अमीर-ज़ादे शरीफ़-ज़ादे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
क्या कहूँ आज की तक़रीब से किस तरह हूँ दूर
अपनी हालत में गिरफ़्तार हूँ और हूँ मजबूर