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नज़्म
सुन लें मेरे बैरी दुश्मन रहज़न दुष्ट कठोर
प्रेम का बल है मेरे मन में भीम का तन में ज़ोर
मासूम शर्क़ी
नज़्म
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
संग को गौहर-ए-नायाब-ओ-गिराँ जाना था
दश्त-ए-पुर-ख़ार को फ़िरदौस-ए-जवाँ जाना था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हल्क़ा-ए-ज़ुल्फ़ कहीं गोशा-ए-रुख़्सार कहीं
हिज्र का दश्त कहीं गुलशन-ए-दीदार कहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
बयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी है
ये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँ
चश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मगर जो बोली तो उस के लहजे में वो थकन थी
कि जैसे सदियों से दश्त-ए-ज़ुल्मत में चल रही हो
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
कल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौत
दश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौत
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जो ताक़-ए-हरम में रौशन है वो शम्अ यहाँ भी जलती है
इस दश्त के गोशे गोशे से इक जू-ए-हयात उबलती है