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नज़्म
क्यूँ न एडीटर बनूँ अख़बार-ए-गौहर-बार का
और क़लम को रूप दूँ चलती हुई तलवार का
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
कि रूसी अदीबों की सर-चश्मा-गाहों को मैं देखना चाहता हूँ''
वो पर्वरदा-ए-अश्वा-बाज़ी