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नज़्म
इस तरह उलझें कि जिस्मों की थकन ख़ुश्बू बने
तो वो घड़ी अहद-ए-वफ़ा की साअत-ए-नायाब है
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
याद है तुम को किन अस्लाफ़ की तुम यादें हो
तुम तो ख़ालिद के पिसर भीम की औलादें हो
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तू और ज़ेब-ओ-ज़ीनत-ए-अलवान-ए-ज़र-निगार
क्या तेरे क़स्र-ए-नाज़ की हिलती नहीं ज़मीं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ज़हरीले काँटों से न उलझें ये नन्ही सी जान
कैसी सुहानी कैसी रसीली बच्चों की मुस्कान
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
हुई बे-वतन कई मिल्लतें सही फ़र्द फ़र्द ने ज़िल्लतें
ये हुकूमतों की हैं इल्लतें अभी इंक़लाब कहाँ हुआ
ज़ेब उस्मानिया
नज़्म
लफ़्ज़ों की जगह इक दूसरे की ख़ामोशी को समझते
मगर इस मुलाक़ात में आठवें बर्र-ए-आज़म से आए
मंज़र लतीफ़
नज़्म
अलावों के क़रीब बैठे हुए कितनी ख़ुनुक शामें
गुज़र जाती हैं जैसे ख़्वाब गुज़रे दिल तड़पता है
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
नज़्म
अलावों के क़रीं बैठे हुए कितनी ख़ुनुक शामें
गुज़र जाती हैं जैसे ख़्वाब गुज़रे दिल तड़पता है