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नज़्म
तो फ़ाक़े के धागों में उलझे बदन की अचानक से आँखों के पर्दे हटे
और वो आलम-ए-ख़्वाब से जाग उट्ठा
ज़ैन अब्बास
नज़्म
तीन दिन किस तरह फ़ाक़े से रहे शाह-ए-ज़फ़र
तीसरे दिन तश्त पर लाए गए बेटों के सर
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
इब्तिदा है तीसरे फ़ाक़े की घर में कुछ नहीं
सोच कर कुछ घर की जानिब चल पड़ा मर्द-ए-हज़ीं
शातिर हकीमी
नज़्म
शऊर अनवर
नज़्म
हमारा फ़ख़्र था फ़क़्र और दानिश अपनी पूँजी थी
नसब-नामों के हम ने कितने ही परचम लपेटे हैं
जौन एलिया
नज़्म
मिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस ने
वो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे
फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे या पा-ए-सलासिल पे जमे