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नज़्म
मिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि है
उस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
दिल पे क्यूँ कर फ़ाश हो जाते हैं आज़ादी के राज़
छेड़ते हैं किस तरह महफ़िल में बेदारी का साज़
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
शुऊ'र जाग उठा तो ये हम पे फ़ाश हुआ
हमारा दौर है अपनी भी क़द्र-ओ-क़ीमत है
मौलवी सय्यद मुमताज़ अली
नज़्म
जो उस की जीत का घर है है मस्कन उस की फ़त्ह का
महल जो है तमन्ना का जो उस की राजधानी है
इब्न-ए-मुफ़्ती
नज़्म
निगाह-ए-अहल-ए-दिल में फ़ाश करती हैं मुझे जैसे
मिरी मजबूरियाँ जिन की प्यास रंज-ए-महरूमी
क़य्यूम नज़र
नज़्म
मक़ाम-ए-अज़्मत-ए-इंसाँ को तू ने फ़ाश किया
जुमूद-बस्ता ग़ुलामी को पाश-पाश किया