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नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
तुम्हारे उजले फ़राख़ हाथों पे नम का इक जाल सा बिछा दें
ख़ुद अपनी आँखों से देख जाओ
अनवर महमूद खालिद
नज़्म
'अक़्ल की वुस'अत है तंग 'इश्क़ की वुस'अत फ़राख़
'अक़्ल दरिया-ए-फ़ुरात 'इश्क़ बहर-ए-बे-कराँ
मक़सूद अहमद मक़सूद
नज़्म
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम