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नज़्म
झूम उठते हैं फ़रिश्ते तक तिरे नग़्मात पर
हाँ ये सच है ज़मज़मे तेरे मचाते हैं वो धूम
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
फ़रिश्ता नींद का नाराज़ है मुझ से ये कहता है
बहुत दिन सो लिए बेदार रह कर भी ज़रा देखो
सरवत हुसैन
नज़्म
मैं इंसाँ हूँ फ़रिश्ता और वली मैं भी नहीं कोई
ख़ता करती हूँ गंगा की धुली मैं भी नहीं कोई