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नज़्म
हक़-परस्ती के लिए जैसे वली उठते हैं
हिफ़्ज़-ए-दीं के लिए फ़रज़ंद-ए-'अली उठते हैं
गुलज़ार देहलवी
नज़्म
ये दुनिया दावत-ए-दीदार है फ़रज़ंद-ए-आदम को
कि हर मस्तूर को बख़्शा गया है ज़ौक़-ए-उर्यानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हवा लहरों पे लिखती है तो पानी पर तहरीर करता है
कि हम फ़रज़ंद-ए-आदम की तरह सब नक़्श-गर हैं
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
शाहबाज़ मेहतिर
नज़्म
मुझ से कुछ पिन्हाँ नहीं इस्लामियों का सोज़-ओ-साज़
ले गए तसलीस के फ़रज़ंद मीरास-ए-ख़लील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ालिद अहमद
नज़्म
'अक़्ल की नादिरा-कारी ने बहुत रुख़ बदले
सर्द होती ही नहीं आतिश-ए-गुलज़ार-ए-ख़लील
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
तेरी मौजें उठ के झुकने में बहुत ही तेज़ हैं
बारगाह-ए-हज़रत-ए-ख़ालिक़ में सज्दा-रेज़ हैं
सलमान ग़ाज़ी
नज़्म
रसूल-ए-रहमत ने ऐसे महरूम आदमी को भी ऐसा दर्जा 'अता किया है
ख़लीफ़ा-ए-वक़्त का भी आक़ा बना दिया है