aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "farzand-e-khalf"
उट्ठो इस तरह कि मैदाँ में बली उठते हैंअम्न का ले के वो 'उन्वान-ए-जली उठते हैंहक़-परस्ती के लिए जैसे वली उठते हैंहिफ़्ज़-ए-दीं के लिए फ़रज़ंद-ए-'अली उठते हैं
जहाँ में दानिश ओ बीनिश की है किस दर्जा अर्ज़ानीकोई शय छुप नहीं सकती कि ये आलम है नूरानीकोई देखे तो है बारीक फ़ितरत का हिजाब इतनानुमायाँ हैं फ़रिश्तों के तबस्सुम-हा-ए-पिन्हानीये दुनिया दावत-ए-दीदार है फ़रज़ंद-ए-आदम कोकि हर मस्तूर को बख़्शा गया है ज़ौक़-ए-उर्यानीयही फ़रज़ंद-ए-आदम है कि जिस के अश्क-ए-ख़ूनीं सेकिया है हज़रत-ए-यज़्दाँ ने दरियाओं को तूफ़ानीफ़लक को क्या ख़बर ये ख़ाक-दाँ किस का नशेमन हैग़रज़ अंजुम से है किस के शबिस्ताँ की निगहबानीअगर मक़्सूद-ए-कुल मैं हूँ तो मुझ से मावरा क्या हैमिरे हंगामा-हा-ए-नौ-ब-नौ की इंतिहा क्या है
हवा लहरों पे लिखती है तो पानी पर तहरीर करता हैकि हम फ़रज़ंद-ए-आदम की तरह सब नक़्श-गर हैंअहल-ए-फ़न हैंज़िंदगी तख़्लीक़ करते हैंसितारा टूट जाता हैमगर बुझने से पहले अपनी इस जगमग इबारत से फ़ना पर ख़ंदा-ज़न होता हैमैं मिट कर भी आने वाले लम्हों में दरख़्शाँ हूँजो पत्ता शाख़ से गिरता हैक़िर्तास-ए-हवा पर दाएरों में लिखता आता हैकि शाख़ों पर तड़पते दोस्तोअगली बहारों में मुझे फिर लौटना है फूटना है टूटना है ख़ाक होना हैमगर वो ख़ाक जो अश्जार की माँ हैवो कौंदा जो घटा पर सब्त कर के दस्तख़त अपनेब-ज़ाहिर जा चुका होता हैछुप कर देखता हैकिस तरह तारीकियों में ज़लज़ले आते हैंमंज़र जाग उठते हैंवो जाँ जो पस-ए-दर कितने बरसों से तन्हा हैइक सहीफ़ा हैकभी सूरज की किरनों में उसे देखोतो पूरी काएनात इस में मुजस्सम पाओगे और झूम जाओगेकिताबें पढ़ने वाले तो न मानेंगेमगर अज़-ख़ाक-ता-अफ़्लाक जो कुछ भी है वो तहरीर हैअल्फ़ाज़ हैं एराब हैं नुक़्ते हैं शोशे हैं कशें हैं दाएरे हैं हर्फ़ हैं जिन में तिलिस्म-ए-ज़िंदगीअसरार का इज़हार करता है
ख़ुद दूदमान-ए-क़िब्ला-ए-आलम करें ख़यालदिल में बहुत दिनों से है काँटा चुभा हुआउस ख़ानदाँ के एक रंगीले पिया के घरफ़रज़ंद-ए-अर्जुमंद के ख़त्ना पे क्या हुआचश्मे उबल रहे थे सुरूर-ओ-नशात केथा चावड़ी का नक़्शा-ए-उर्यां खिंचा हुआइस महफ़िल-ए-नशात के नर्ग़े में वो भी थेचेहरे पे जिन के ज़ोहद-ओ-वरा था लिखा हुआक़व्वाल गा रहे थे ख़ुज़ू'-ओ-ख़ुशू' सेरिंदान-ए-बुल-हवस में था ग़ौग़ा मचा हुआबादा-गुसार खोल के बैठे थे बोतलेंथा रंडियों के सामने हुक़्क़ा धरा हुआना'त-ए-नबी पे इस्मत-ए-आवारा नुक्ता-चींख़ौफ़-ए-ख़ुदा था ज़ोहरा-वशों में घिरा हुआदौलत के ढेर 'ज़ाहिदा' परवीन पे निसारदहक़ान-ए-ख़स्ता-हाल का चूल्हा बुझा हुआथे ख़ादिमों के पेट पे पत्थर बंधे हुएऔर कंचनों पे बाब-ए-सख़ावत खुला हुआ'शोरिश' उस एक मंज़र-ए-ज़ोहरा-गुदाज़ मेंदस्त-ए-दुआ' था अर्श की जानिब उठा हुआइस हश्र-ए-नौ में क़िब्ला-ए-आलम कहाँ थे आपदेखा तो होगा आप ने जो माजरा हुआ
तुम्हें क्या लगता है अल्लाह की शा'इर से कोई दुश्मनी हैवो शा'इर की मज़म्मत किस लिए करता है और तुम आयतें सर पर उठा कर शा'इरी पर थूकते होतुम्हें क्या लगता है तुम वही के मा'नी समझते हो तुम्हें इल्हाम का मतलब पता हैतुम्हें वो लोग हस्सान-इब्न-ए-साबित का त'आरुफ़ क्यों नहीं करवाते जो तुम को बताते हैं कि शा'इर शर है झूठा है फ़सादी हैवो हस्सान-इब्न-ए-साबित मिम्बर-ए-नबवी पे अपनी शा'इरी गाता हुआ शा'इरतुम्हें मा'लूम है हस्सान की ख़ातिर दु'आएँ कौन करता थाअरे इक़बाल के इक़बाल को सर पर उठाने वालो जब 'इक़बाल' कहता हैये दुनिया दा’वत-ए-दीदार है फ़रज़ंद-ए-आदम कोकि हर मस्तूर को बख़्शा गया है ज़ौक़-ए-‘उर्यानीतो तुम मुँह क्यों छुपाते हो मुनाफ़िक़ होतुम्हें क्या लगता है तुम शे'र की बुनियाद पर अश'आर को धुत्कार दोगे शा'इरों को मार दोगेतुम्हें क्या लगता है मैं तुम पे क्यों रोता हूँ जब तुम शा'इरों के कत्बे ग़ाएब करते होतुम्हें क्या लगता है मैं तुम पे क्यों हँसता हूँ जब तुम शा'इरों की क़ब्रों को रद्दी बना कर बेचते होतुम्हें मा'लूम है ये ख़िज़्र उस को भी अमर कर देते हैं जिस से मोहब्बत करते हैंतुम्हें क्या लगता है तख़्लीक़-कारी किस का शेवा होता हैइल्हाम किस पे होता है और वही किस पे आती हैतुम्हें क्या लगता है शा'इर पे जब इल्हाम होता है तो उस के ज़ह्न में आने से पहले मिसरे किस के हाथ में होते हैंउन का कौन नहला कर नए कपड़ों में कंघी कर के माथा चूमता हैतुम्हें क्या लगता है तुम शा'इरों के सोचने की हद को जा सकते हो बच्चे होजहाँ तुम अच्छा बनने के लिए घिस के पहुँचते हो वहाँ पर शा'इरों की मश्क़ के मतरूक मिसरे बासी हो कर मरते हैंशा'इर वहाँ मायूस रहता है जहाँ तुम मुक्ती के चक्कर में जाना चाहते होतुम्हें क्या लगता है शा'इर के बारे में तुम्हें जो लगता है वो ठीक हैक्या ठीक है और क्या नहीं है कौन जाने पर मैं इतना जानता हूँएक अच्छे आदमी से इक बुरा शा'इर बड़ा होता है 'मेहतर'
'सईद' लेकिन उसी को चाहूँजिसे दुआ-ए-ख़लील माँगे
कोई सूरत फ़न-ए-अर्ज़-ए-हुनर आ जाए मुझे भीशाम को शाम कहूँ और निगाहों पे अँधेरे उतर आएँसुब्ह को सुब्ह लिखूँ और पस-ए-सत्र-ए-तपाँ धूप-भरा दिन निकल आएकल भी तासीर-ए-तही था मिरा दामान-ए-सुख़न आज भी तासीर-ए-तही हैमेरा दामान-ए-दुआ सर-ए-दरबार-ए-अता आज भी फ़ैज़ान-ए-तलब है
तुम हो डुगडुगी वालेडुगडुगी बजाते होऔर चाहते हो येडुगडुगी के बजते हीख़ल्क़-ए-शहर-ए-बे-परवानाचने में लग जाएतुम हो डुगडुगी वालेपर ये लोग जिन को तुमडुगडुगी के पर्दे मेंनाचना सिखाते होआँख भी तो रखते हैंसोच भी तो सकते हैंतुम हो डुगडुगी वालेकोई आने वाला दिनइस तरह भी आएगाडुगडुगी के बजते हीख़ल्क़-शहर-ए-बे-परवाग़फ़लतों से जागेगीऔर तुम्हारे हाथों मेंडुगडुगी के बदले इकआइना थमा देगीतुम हो डुगडुगी वालेडुगडुगी बजाते हो
कुछ वक़्फ़-ए-तबस्सुम होंट भी हैं, कुछ रस्ता तकती आँखें भीकुछ वो हैं जिन से मिलने को बे-ताब हों मेरी बाँहें भीपर, एक ख़लिश सी रहती है
जब भी कभी जन्नत को तसव्वुर में बसायाऐ माँ मिरी ख़ुद को तिरे क़दमों में ही पायादुनिया के किसी पेड़ की छाँव में नहीं हैजो मुझ को अता करता है ठंडक तिरा सायाउस रब का अदा शुक्र भला क्यों न करूँ मैंजिस ने तिरी सूरत में ही जन्नत को दिखायाधरती पे मैं अब इस लिए पैरों पे खड़ा हूँमैं चलते हुए जब भी गिरा तू ने उठायायूँ ही तो नहीं गुज़रा ये झोंका मुझे छूकर'ख़ालिद' मुझे लगता है मिरी माँ ने बुलाया
हुज़ूर मेरी बिसात क्या है कि ना'त लिक्खूँमैं आप का इक बहुत गुनहगार उम्मती हूँमिरी ज़बाँ पर कसाफ़तें हैंदिमाग़-ओ-दिल में ग़लाज़तें हैंहुज़ूर मेरी बिसात क्या है कि ना'त लिक्खूँमगर नहीं मैं बहुत ही 'आली हसब नसब हूँकि आप ही का ग़ुलाम-ए-इब्न-ए-ग़ुलाम-ए-इब्न-ए-ग़ुलाम हूँ मैंभला बताएँ कि मेरे आगे तमाम शाहान-ए-अज़मिना की बिसात क्या हैहुज़ूर ये इक़्तिदार-ज़ादे हवस के बंदेमैं इन के शजरे से बा-ख़बर हूँ कि ख़्वाहिशों के ग़ुलाम-ए-इब्न-ए-ग़ुलाम-ए-इब्न-ए-ग़ुलाम हैं येहुज़ूर मैं इन ग़ुलाम-ज़ादों के तख़्त-ओ-ताज और सल्तनत के सभी तिलिस्मात जानता हूँमैं इन की औक़ात जानता हूँतमाम फ़िर'औनियत के क़िल’ओं की और फ़सीलों की अस्ल बुनियाद इब्न-ए-आदम के ख़ून और हड्डियों से ता'मीर की गई हैमगर हुज़ूर आप की हुकूमत तमाम शाहों से मुख़्तलिफ़ हैकि आप के पास एक चादर है एक तह-बंद इक 'अमामाखजूर की छाल और पत्तों का एक बिस्तरसो ऐ ज़माने के बादशाहोलो तुम भी देखो ये शाह-ए-कौनैन का असासामैं इस ज़माने के सारे नमरूद और शद्दाद और क़ारून और हामान और फ़िर'औन को दिखा दूँकि मेरे आक़ा की सल्तनत में कोई नहीं है जो भूक से बिलबिला रहा होहुज़ूर की मम्लिकत में दौलत का एक हिस्सा ग़रीब लोगों की मिलकियत हैसुनो रफ़ीक़ान-ए-इश्तिराकीतमाम जब्र-ए-म’आश का बस यही निज़ाम-ए-ज़कात हल हैदलित की महरूमियों पे आँसू बहाने वालोसुनो ये तारीख़ कह रही हैबिलाल जैसे ग़ुलाम जिन को महा-दलित से भी पस्त समझा गया 'अरब मेंरसूल-ए-रहमत ने ऐसे महरूम आदमी को भी ऐसा दर्जा 'अता किया हैख़लीफ़ा-ए-वक़्त का भी आक़ा बना दिया हैसुनो ऐ तानीसयत के ना'रे लगाने वालोरसूल-ए-इंसानियत ने मज़लूम 'औरतों को हयात बख़्शीरुसूम-ए-वहशत के ख़ूनी पंजों से उन को राह-ए-नजात बख़्शीतमाम 'इज़्ज़त वक़ार की काएनात बख़्शीहुज़ूर क्या है बिसात मेरी कि ना'त लिक्खूँमगर मैं दुनिया के हिटलरों की समा'अतों को जगा रहा हूँतमाम दहशत-पसंद लोगों को आज मैं ये सुना रहा हूँतमाम इंसानियत के क़ातिल गिरोहों को ये बता रहा हूँरसूल-ए-रहमत की ज़िंदगी का ये बाब रौशन दिखा रहा हूँमैं आज ताएफ़ हुदैबिया और फ़त्ह-ए-मक्का की याद उन को दिला रहा हूँहुज़ूर मेरी बिसात क्या है कि ना'त लिक्खूँमगर मिरी एक आरज़ू है कि अपने ख़ून-ए-जिगर से औराक़-ए-ज़िंदगी पर बस आप ही की सिफ़ात लिक्खूँ
चौदहवीं की शब है लेकिन मातमी मल्बूस में लिपटी हुई हैचाँदनी भी आँसुओं में तर-ब-तर हैआसमाँ हद्द-ए-नज़र तक आसमाँ है या धुआँ हैहर तरफ़ इक ख़ामुशी महव-ए-फ़ुग़ाँ हैगुल से ख़ुशबू बेवफ़ाई कर चुकी हैमानी-ओ-बहज़ाद नक़्श-ओ-रंग सारे खो चुके हैंबरबत-ओ-नय से ख़ुशी और सरख़ुशी रूठी हुई हैरक़्स की मौजें बदन की हरकतों से और अदाओं से ख़फ़ा हैंशा'इरी से लफ़्ज़-ओ-मा'नी का त'अल्लुक़ ज़ख़्म-ख़ुर्दा हो चुका हैआज की शब क्या हुआ हैक्यों ज़मीन-ओ-आसमाँ में हर तरफ़ मातम बपा हैवाट्सएप पर तुम को देखातब ये राज़ इफ़्शा हुआ हैएक डी-पी की उदासी काएनाती हो गई है
पड़ रहा है तुझ पे अक्स-ए-जिब्रईलतुझ से है सैराब गुलज़ार-ए-ख़लील
किसी सितारा-ए-तन्हा का इर्ति'आश-ए-ख़फ़ीकिसी अलाव में सहमी हुई सी चिंगारी
चाँद ने मुझ से कहा ऐ शायर-ए-फ़िक्र-ए-अज़लमेरे बारे में भी लिख दे कोई संजीदा ग़ज़लहर तअल्लुक़ तोड़ रक्खा है हिलाल-ए-ईद सेतुझ को फ़ुर्सत ही नहीं है मह-वशों की दीद सेरस्म-ए-दीदार-ए-हिलाल-ए-ईद, अफ़्साना हुईबाम पर उस दम चढ़े, जिस वक़्त फ़रज़ाना हुईले के नज़राना कमेटी ने उजाला है मुझेगर नहीं निकला, ज़बरदस्ती निकाला है मुझेमें जो बे-मर्ज़ी निकल आया तो डाँटा है बहुतमौलवी ने मुख़्तलिफ़ ख़ानों में बाँटा है बहुतइस को मत फॉलो करो, इस की तरीक़त माँद हैतुम बरेली के हो और ये देवबंदी चाँद हैये जो ख़ूँ-आलूद है, अफ़्ग़ानियों का चाँद हैमुख़्तलिफ़ टुकड़ों में पाकिस्तानीयों का चाँद हैइक कराची से है निकला इक पस-ए-लाहौर हैसिंध का चाँद और है पंजाब का चाँद और हैवो जो हम-साए की बीवी है ग़ज़ाला चाँद हैऔर उस के साथ जो रहता है काला चाँद हैशायरों ने अपने शेरों में बहुत पेला मुझे'मीर' ओ 'ग़ालिब' ने भी समझा ख़ाक का ढेला मुझेशेर में, रश्क-ए-क़मर लैला को फ़रमाने लगेट्यूब-लाईट को हिलाल-ए-ईद बतलाने लगेअपनी बीवी से कहा उनत्तीसवीं का चाँद होऔर पड़ोसन से कहा तुम चौदहवीं का चाँद होआम सी औरत को मह-पारा बना कर रख दियाचाँद को टूटा हुआ तारा बना कर रख दियाचाँद पर जिस दिन से इंसाँ के क़दम पड़ने लगेचाँदनी जिन से हो ऐसे बल्ब कम पड़ने लगेमैं ज़मीं से दूर हूँ लेकिन बहुत नज़दीक हूँऐ ज़मीं वालो मैं तुम से दूर रह कर ठीक हूँमैं ज़मीं पर आ गया तो हर बशर ले जाएगासब से पहले टेन-परसेंट अपने घर ले जाएगा
मियान-ए-हिन्द-ओ-पाकिस्तान इक सरहद का झगड़ा हैवगर्ना इस इमारत के मनारे एक जैसे हैंकराची का किचन हो या वो दकन की ''रसोई'' होनमक का फ़र्क़ है बैंगन भगारे एक जैसे हैंपजामों के डिज़ाइन को बदल डाला तो क्या ग़म हैहमारी बीवियों के तो ग़रारे एक जैसे हैंपरेशाँ हाल है पब्लिक मगर दोनों मुमालिक केमिरासी क्रिकेटर फ़िल्मी सितारे एक जैसे हैंकँवारे लोग तो हर मुल्क में आज़ाद फिरते हैंमगर शादी-शुदा क़िस्मत के मारे एक जैसे हैंबराए अक़्द-ख़्वानी क़ाज़ियों में फ़र्क़ है लेकिनकराची और दिल्ली के छुवारे एक जैसे हैंकँवारा आदमी हो या कोई आज़ाद लीडर होजो बे-पेंदे के लोटे हैं वो सारे एक जैसे हैंनिकम्मे रहनुमा और अक़्ल से पैदल सियासत-दानहमारे एक जैसे हैं तुम्हारे एक जैसे हैंयहाँ का ख़ालिद-ए-इरफ़ाँ वहाँ के 'राहत'-इंदोरीनिरे शायर हैं दोनों के सितारे एक जैसे हैं
मैं ने इंटरव्यू किया कल एक रोज़ा-ख़ोर सेमैं ज़बाँ से बोलता था वो शिकम के ज़ोर सेमैं ने पूछा आप ने रोज़ा ये क्यूँ रक्खा नहींपेट दिखलाने लगा बोला कि यूँ रखा नहींरोज़ा यूँ रक्खा नहीं चलती नहीं बाद-ए-सबामौसम-ए-गर्मा में रोज़े आए हैं इस मर्तबाजॉब करनी है ज़रूरी काम करना है मुझेकोक पिज़्ज़ा के सहारे शाम करना है मुझेमैं ने लस्सी के गिलासों में पिया कुछ और हैदोपहर में मुर्ग़ खाने का मज़ा कुछ और हैदिन में खाने के लिए इक़रार कर लेता हूँ मैंशाम को मस्जिद में भी इफ़्तार कर लेता हूँ मैंकोई शय खाते हुए मैं ने छुपाई ही नहींआज तक मेरी हुई रोज़ा-कुशाई ही नहींरोज़ा-ख़ोरी पर मिरी दुनिया को हैरानी नहींरोज़ा यूँ रक्खा नहीं बिजली नहीं पानी नहींमैं जो बे-रोज़ा हूँ ये भी ताजिरों का ज़र्फ़ हैसौ रूपे उजरत है मेरी सौ रूपे का बर्फ़ हैरूह-अफ़्ज़ा के बिना दुनिया की हूरें रह गईंरोज़ा-दारों के लिए सूखी खजूरें रह गईंरोज़ा यूँ रक्खा नहीं हो जाएगा खाना ख़राबलंच पर आएगी कल होटल में रश्क-ए-माहताबमैं हूँ शायर मेहरबाँ है मुझ पे ख़ल्लाक़-ए-अज़लपेश करनी है मुझे महफ़िल में इक ताज़ा ग़ज़लअज्र-ए-रोज़ा क्या है ये शेरों में बतलाऊँगा मैंलंच मैं इफ़्तार की तशरीह बन जाऊँगा मैंभूक और शायर का चूँ-कि चोली-दामन का है साथमुझ से बढ़ के जानता है कौन रोज़ा की सिफ़ातपंद्रह घंटे का रोज़ा हर जवान ओ पीर काशाम करना सुब्ह का लाना है जू-ए-शीर का
है किसी तिफ़्ल-ए-मुहाजिर की तरह सहमा हुआ'ख़ालिद-ए-इरफ़ाँ' की शादी का छुआरा देखना
मुझे हसरत हैमेरा नज़्म-कर्दा फ़ल्सफ़ा तुम को समझ आएतुम्हें ये फ़ल्सफ़ा बावर कराने के लिए मेरे सिवा अफ़्लाक से अब कोई भी आदम नहीं गिरनातुम्हारे जिस्म से मुझ तक जो दूरी हैतुम्हें मालूम हो ये एक थ्योरी हैआदम नाम का धब्बाज़मीन-ओ-आसमाँ का फ़ासला तय कर के तुम को सिर्फ़ इतना बोलने आया हूँसुन लोमुझे आँखों के हर वीरान सपने की क़सम हैतुम्हारे जिस्म की तख़्लीक़ के दौरान जो मिट्टी बची थीउसी मिट्टी से मेरी रूह-ए-पेचीदा बनी हैहरीम-ए-मनबरहमन नाम की ऊँची पहाड़ी से मोहब्बत नाम का झरना निकलने तकमुझे शूदर समझनाअगरचे मैं तुम्हारी पाक मिट्टी से बना हूँमुझे तस्वीर करनाहिना की उँगलियों पर फूटते रंगों से ख़ुद में रंग भरना मुस्कुरानाऔर मुझ को सोच लेना भूल जानासिवाए लम्स मैं दुनिया के हर जज़्बे की ख़ालिस शक्ल में तुम को मिलूँगाढूँढनातावीज़ मत करना मुझे अपने गले काहमारे बीच छू लेने की आसानी नहीं हैहरीम-ए-जानमैं ऐसा सहीफ़ा हूँ जो उतरा हूँ तुम्हारे पाक सीने मेंअगर तुम चाहती हो मैं अमर हो जाऊँ तो फिरमुझे महसूस करनासाहिली मिट्टी से आदम ज़ात की तख़्लीक़ होने तक
'इश्क़ हीरा है गुहर है तो कभी पत्थर है'इश्क़ आग़ाज़ से अंजाम तलक रहबर है'इश्क़ इंसाँ के लिए बेश-बहा दौलत है'इश्क़ मिल जाए जिसे उस की बड़ी क़िस्मत है'इश्क़ हैवान को इंसान बना देता है'इश्क़ हर काम को आसान बना देता है'इश्क़ खो जाए तो इंसान बिखर जाता है'इश्क़ मिल जाए तो शैतान सँवर जाता है'इश्क़ अंदाज़-ए-मोहब्बत का कँवल होता है'इश्क़ तहरीर जो बन जाए ग़ज़ल होता है'इश्क़ हर तरह से पहचान बना लेता है'इश्क़ का मर्तबा दुनिया में बहुत ऊँचा है'इश्क़ ईमान है फ़रमान है फ़ैज़ान भी है'इश्क़ पहचान है मीज़ान है नुक़्सान भी है'इश्क़ महरूम है मज़लूम है मस्मूम भी है'इश्क़ की सारे ज़माने में बहुत धूम भी है'इश्क़ तफ़्सील है तश्कील है तमसील भी है'इश्क़ तसहील है तामील है तकमील भी है'इश्क़ मा'बूद है मक़्सूद है मौजूद भी है'इश्क़ महदूद है महमूद है मशहूद भी है'इश्क़ तम्हीद है तक़लीद है तन्क़ीद भी है'इश्क़ ताईद है तज्दीद है ख़ुर्शीद भी है'इश्क़ तालिब भी है ग़ालिब भी है तहज़ीब भी है'इश्क़ वाजिब भी है राहिब भी है तर्ग़ीब भी है'इश्क़ तक़्दीस है और बाइस-ए-अग़लात भी है'इश्क़ अफ़सोस है अमराज़ है मुहतात भी है'इश्क़ से ज़ख़्म जो मिल जाए सँभाले रखिए'इश्क़ मिट जाए तो यादों को उजाले रखिए
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