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नज़्म
कैसी पुर्वा आज चली है दर्द पुराने जाग उठे
वक़्त की ढलती छाँव में बैठे अपनी गाथा लिखते थे
रिज़्वानुल्लाह
नज़्म
दिल की धड़कन की गाथा में मन की तड़पन के अफ़्साने
ये पापी दुनिया क्या समझे ये जग हत्यारा क्या जाने
श्री अमर अमृतसरी
नज़्म
कैसी पुर्वा आज चली है दर्द पुराने जाग उठे
वक़्त की ढलती छाँव में बैठे अपनी गाथा लिखते थे
रिज़्वानुल्लाह
नज़्म
वो हँसती हो तो शायद तुम न रह पाते हो हालों में
गढ़ा नन्हा सा पड़ जाता हो शायद उस के गालों में
जौन एलिया
नज़्म
तू बधिया लादे बैल भरे जो पूरब पच्छम जावेगा
या सूद बढ़ा कर लावेगा या टूटा घाटा पावेगा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने का
हयात-ए-जावेदाँ मेरी न मर्ग-ए-ना-गहाँ मेरी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवानी है सुहाग उस का तबस्सुम उस का गहना है
नहीं आलूदा-ए-ज़ुल्मत सहर-दामानियाँ उस की