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नज़्म
घुला घुला सा फ़लक है धुआँ धुआँ सी है शाम
है झुटपुटा कि कोई अज़दहा है माइल-ए-ख़्वाब
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
कितने लहजों की कटारें मिरी गर्दन पे चलीं
कितने अल्फ़ाज़ का सीसा मिरे कानों में घुला
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
यूँ आए हैं घिर घिर के ये दुख-दर्द के बादल
तारीक फ़ज़ाओं में घुला जैसे हो काजल
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
कभी रातों में घुला नश्शा-ए-सहबा-ए-बहार
कभी सुब्हों में मिरी गर्मी-ए-हंगाम-ए-नुशूर