aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "gi.dgi.daa.ii"
मुद्दतों मैं इक अंधे कुएँ में असीरसर पटकता रहा गिड़गिड़ाता रहारौशनी चाहिए، चाँदनी चाहिए، ज़िंदगी चाहिएरौशनी प्यार की, चाँदनी यार की, ज़िंदगी दार कीअपनी आवाज़ सुनता रहा रात दिनधीरे धीरे यक़ीं दिल को आता रहासूने संसार मेंबेवफ़ा यार मेंदामन-ए-दार मेंरौशनी भी नहींचाँदनी भी नहींज़िंदगी भी नहींज़िंदगी एक रातवाहिमा काएनातआदमी बे-बिसातलोग कोताह-क़दशहर शहर-ए-हसदगाँव इन से भी बदइन अंधेरों ने जब पीस डाला मुझेफिर अचानक कुएँ ने उछाला मुझेअपने सीने से बाहर निकाला मुझेसैकड़ों मिस्र थे सामनेसैकड़ों उस के बाज़ार थेएक बूढ़ी ज़ुलेख़ा नहींजाने कितने ख़रीदार थेबढ़ता जाता था यूसुफ़ का मोललोग बिकने को तय्यार थे
शजर हजर पे हैं ग़म की घटाएँ छाई हुईसुबुक-ख़िराम हवाओं को नींद आई हुईरगें ज़मीं के मनाज़िर की पड़ चलीं ढीलीये ख़स्ता-हाली ये दरमांदगी ये सन्नाटाफ़ज़ा-ए-नीम-शबी भी है सनसनाई हुईधुआँ धुआँ से मनाज़िर हैं शबनमिस्ताँ केसय्यारा रात की ज़ुल्फ़ें हैं रस्मसाई हुईये रंग तारों भरी रात के तनफ़्फ़ुस काकि बू-ए-दर्द में हर साँस है बसाई हुईख़ुनुक उदास फ़ज़ाओं की आँखों में आँसूतिरे फ़िराक़ की ये टीस है उठाई हुईसुकूत-ए-नीम-शबी गहरा होता जाता हैरगें हैं सीना-ए-हस्ती की तिलमिलाई हुईहै आज साज़-ए-नवा-हा-ए-ख़ूँ-चकाँ ऐ दोस्तहयात तेरी जुदाई की चोट खाई हुईमिरी इन आँखों से अब नींद पर्दा करती हैजो तेरे पंजा-ए-रंगीं की थीं जगाई हुईसरिश्क पाले हुए तेरे नर्म दामन केनशात तेरे तबस्सुम से जगमगाई हुईलटक वो गेसुओं की जैसे पेच-ओ-ताब-ए-कमंदलचक भवों की वो जैसे कमाँ झुकाई हुईसहर का जैसे तबस्सुम दमक वो माथे कीकिरन सुहाग की बिंदी की लहलहाई हुईवो अँखड़ियों का फ़ुसूँ रूप की वो देविय्यतवो सीना रूह-ए-नुमू जिस में कनमनाई हुईवो सेज साँस की ख़ुशबू को जिस पे नींद आएवो क़द गुलाब की इक शाख़ लहलहाई हुईवो झिलमिलाते सितारे तिरे पसीने केजबीन-ए-शाम-ए-जवानी थी जगमगाई हुईहो जैसे बुत-कदा आज़र का बोल उठने कोवो कोई बात सी गोया लबों तक आई हुईवो धज वो दिलबरी वो काम-रूप आँखों कासजल अदाओं में वो रागनी रचाई हुईहो ख़्वाब-गाह में शोलों की करवटें दम-ए-सुब्हवो भैरवीं तिरी बेदारियों की गाई हुईवो मुस्कुराती हुई लुत्फ़-ए-दीद की सुब्हेंतिरी नज़र की शुआओं की गुदगुदाई हुईलगी जो तेरे तसव्वुर के नर्म शोलों सेहयात-ए-इश्क़ से उस आँच की तिपाई हुईहनूज़ वक़्त के कानों में चहचहाहट हैवो चाप तेरे क़दम की सुनी-सुनाई हुईहनूज़ सीना-ए-माज़ी में जगमगाहट हैदमकते रूप की दीपावली जलाई हुईलहू में डूबी उमंगों की मौत रोक ज़राहरीम-ए-दिल में चली आती है ढिटाई हुईरहेगी याद जवाँ-बेवगी मोहब्बत कीसुहाग रात की वो चूड़ियाँ बढ़ाई हुईये मेरी पहली मोहब्बत न थी मगर ऐ दोस्तउभर गई हैं वो चोटें दबी-दबाई हुईसुपुर्दगी ओ ख़ुलूस-ए-निहाँ के पर्दे मेंजो तेरी नर्म-निगाही की थीं बिठाई हुईउठा चुका हूँ मैं पहले भी हिज्र के सदमेवो साँस दुखती हुई आँख डबडबाई हुईये हादसा है अजब तुझ को पा के खो देनाये सानेहा है ग़ज़ब तेरी याद आई हुईअजीब दर्द से कोई पुकारता है तुझेगला रुंधा हुआ आवाज़ थर थर्राई हुईकहाँ है आज तू ऐ रंग-ओ-नूर की देवीअँधेरी है मिरी दुनिया लुटी-लुटाई हुईपहुँच सकेगी भी तुझ तक मिरी नवा-ए-फ़िराक़जो काएनात के अश्कों में है नहाई हुई
चला धीमे धीमे से कछवे की चालपहुँचते पहुँचते उसे ग़ार तक शाम होने लगीउसे देख कर शेर भन्ना गयाछटंकी बराबर ये ख़ुराक भेजी है जंगल नेऔर इस क़दर देर सेमिटा दूँगा ख़रगोश की ज़ात कोमैं जंगल का जंगल ही खा जाऊँगासुना और ख़रगोश रोने लगागिड़गिड़ाने लगाहुज़ूर इस में मेरी नहीं है ख़तान जंगल सभा का कोई दोष हैकि जंगल ने तो सात ख़रगोश भेजे मगरमगर क्यामगर सरमगर क्या क्यूँ हकला रहे हो बताओ मुझेमगर मगर मगर सरकहाँ हैं तुम्हारे छे ग़द्दार साथीवो ख़रगोश फिर से सिसकने लगाहमें रास्ते में हुज़ूर एकज़ालिम ने रोका थाऔर बहुत गालियाँ आप को दींकहा मैं दोहराऊँ कैसे वो सब कुछ हुज़ूरकहा जाओ कह दो मिरे साथियों को वही खा गयाये सुनना था कि शेर ग़ुर्राया मोंछों में बल आ गएअकड़ने लगी उस की हंटरी पूँछऔर आँखों में बस ख़ून उतरने लगाकहाँ है किधर है बता कौन हैमिरे होते किस का हुआ हौसलाकि मेरी रेआ'या पे कोई ज़ुल्म कर सके
दवा की शीशी मेंसूरजउदास कमरे में चाँदउखड़ती साँसों में रह रह केएक नाम की गूँज....!तुम्हारे ख़त को कई बार पढ़ चुका हूँ मैंकोई फ़क़ीर खड़ा गिड़गिड़ा रहा था अभीबिना उठे उसे धुत्कार कर भगा भी चुका
मैं देखता हूँवीरान शाह-राहों पर रेंगती ख़ामोशीसूरज के घर लौटते हीबे-लिबास हो कर नाचने लगती हैऔर तलाश करती है कुछ मुस्कुराते चेहरेअंधेरा छाने लगता हैवीरानी दालान में बैठी बैन करती औरअपनी महरूमी का इज़हार करती हैकिराए के क़ब्रिस्तान में दफ़्न मुर्देरात-भर एहतिजाज करते हैंअपनी ना-मुकम्मल ख़्वाहिशों को सड़कों पर जलाते हैंजिस के धुएँ से आसमान कारंग काला पड़ जाता हैरात की तारीकी मनहूस आवाज़ें निकालती हैवीरान सड़क के एक तरफ़ खड़ी बूढ़ी तवाइफ़अपने गाहक के रवय्ये से खौफ़ज़दा हैउल्लू और चमगादड़ भी रात से ख़फ़ा हो करअब दिन में सफ़र करते हैंमुर्दा रात गहरी हो जाती हैजाड़े की ठिठुराती सर्दी मेंफ़ुटपाथ पर बैठी एक नन्ही कलीएक रोटी के लिए ख़ुदा के सिग्नेचर की मुंतज़िर हैमहँगी गाड़ियों के सामनेगिड़गिड़ाती तवाइफ़ का एक आँसूमेरे ज़ेहन मेंबे-शुमार सवालात छोड़ गया है
बहुत अय्यार थे वो लोगवो सारा दिन ख़ुदा को याद करतेमस्जिदों में जातेरोते गिड़गिड़ाते और तस्बीहें पढ़ा करतेज़माना मो'तक़िद था इस क़दर उन कावो जब बाहर निकलतेलोग उन के रास्ते की गर्द कोअपने अमामों से हटाते थेउन की ख़ातिर ख़्वान पर नेमत सजाते थे
''तुम्हें साबित करना होगा कि तुम हो''! उस ने मुझे झिंझो़ड़ा''मगर मैं ये साबित नहीं कर सकती'' मैं ने एहतिजाज कियाउस ने मुझे मुट्ठी में भर कर ज़मीं पर बिखेर दिया और ख़ुशी से चिल्लाया! ''तुम सब्ज़ा ही सब्ज़ा हो, रंग ही रंग हो''''ठहरो! ज़रा सोचो! मुझे जल्द ख़िज़ाँ के नादीदा हाथ मादूम कर देंगे...... तुम ये साबित नहीं कर सकोगे कि मैं हूँ''उस ने घबरा कर मुझे फिर समेट लिया और ज़रा तवक़्क़ुफ़ के ब'अद फ़ज़ा में उछाल दिया और पुर-जोश हो कर बोला''देखा तुम रौशनी ही रौशनी हो''''हाँ मगर तारीकी मुझे निगलने को बेताब है! मैं ने कहा था ना मैं ख़ुद को साबित करने से क़ासिर हूँ''उस ने हिरासाँ हो कर मुझे मुट्ठी में जकड़ लिया...... ना-तमामी के दर्द से मेरी आँखें छलक पड़ींउस ने मुझे बहने के लिए नशेब में छोड़ दिया और मुस्कुराया''देखा तुम माया ही माया हो''''मुझे वक़्त की तेज़ धूप जल्द ख़ुश्क कर देगी'' मैं ने दुहाई दीवो ग़ुस्से से काँपने लगा..... फिर मुझे सामने रख कर गिड़गिड़ाया''ख़ुद को साबित करो ख़ुदा-रा नहीं तो मैं मिट जाऊँगा!हमारी तकमील ज़रूरी है''''ना-गुज़ीर है! मैं ने ताईद कीआओ मैं तुम्हें ज़ेब-ए-तन कर लूँ! नहीं तो हम तस्दीक़ के हक़ से महरूम हो जाएँगे, हम कभी साबित न हो सकेंगे''''हाँ हमें अपनी तस्दीक़ करनी होगी'' उस ने मुझ में ज़म होते हुए कहा.....और फिर हम ने देखा... रंग... राेशनी... सब्ज़ा... माया... हुस्न और हैरत सब हमारे बुतून की जागीरें थींबाहर तो सिर्फ़ धुआँ था
मैं लिख दूँ वहाँवो लफ़्ज़जो मेरे अंदर मर रहे हैंपर लिख नहीं सकतादीवारें रोकती हैं मुझेरोकती हैंमेरे अंदरदीवारों को गिरने सेएक जनरल कहता हैया अवाम का नुमाइंदा कहता हैचुप रहोगिड़गिड़ाते हुए बोलोमैं लिख दूँमेरी माँ को मेरी महबूबा होना चाहिए थाऔर मेरे बाप कोमेरी आँखों से दूर
मिरी साँस का सिलसिलायूँ न टूटे कि इक तुंद झोंके के मानिंद उड़ती हुई उम्र मेरीकिसी बंद उजड़े हुए शहर में दफ़अ'तन ख़ुद को पाएभयानक ख़मोशी का इक डोलता क़हक़हाउस की रग रग में उतरे तो वो बौखलाएक़तारों में लेटी हुई मुर्दा गलियों में भटकेमकानों में उतरे मुंडेरों पे आएसियह छोटी ईंटों की फ़र्सूदा दीवार को अपनी पोरों से छू करकोई दर ढूँडे कोई राह माँगेअचानक किसी सर्द खम्बे की बे-नूर आँखों से झाँकेबड़े कर्ब से गिड़गिड़ाएख़ुदारा कोई मुझ को बाहर निकलने का रस्ता बताएख़ुदारा कोई मुझ को बाहर निकलने का रस्ता बताए
दर पे आए हैं जी वोटों के गदागर देखोमाँगते हैं भीक कैसे गिड़गिड़ा कर देखो
वो रात गहरीउस पर टूटते जिस्मों का बोझझोंपड़ों में ऊँघते नंगे चराग़ों की भड़ककर्ब का ए'लान ताज़ायक-ब-यकमस्जिदों में जल उठी नारों की बोसीदा ज़बाँथरथरा कर गिर पड़े सज्दों में लोगगोलियों की तड़तड़ाहटख़ून मशअ'ल ज़ुल्म मौतख़ंजरों के पाँव से रौंदी हुई दोशीज़गीकुछ नहीं कुछ भी नहीं हैख़ौफ़ से लर्ज़ां शराफ़त ख़ुद-कुशी का नाम हैबंदगी पूजा इबादत इस लिए बदनाम हैसब गँवा कर गाँव वाले गिड़गिड़ाते रह गएगाँव की सब बेटियाँ डाकू उठा कर ले गएपासबाँ ख़ामोश हैं अहल-ए-सियासत भी ख़मोशरिश्वतों पर बिकने वाली हर अदालत भी ख़मोश
हम उस मसीहा की आमद के आसार के मुंतज़िर ही रहेफिर सड़कों पर चंद तवाइफ़ें नज़र आईंशायद वो नज़र आ गया हैहाँ हाँ तवाइफ़ों ने ललचाई आवाज़ में कहाचलो हमें अपनी गाड़ियों में ले चलोदरख़्त आबनूसी ख़यालों में मुदग़म रहेजब उस ने गले से लटकते माइक्रो फ़ोन पर कई दिन तक चीख़ चीख़ कर कहा मैं मसीहा हूँतो इदारा-ए-इमदाद-ए-बाहमी वालों ने उसे खाने पर बुलायाखा पी कर उस ने तक़रीर कीगिड़गिड़ा कर कहा मैं मसीहा हूँ मुझे सलीब पर लटका दोलोगों ने वापसी का किराया दे कर उसे रुख़्सत कर दिया
अगर कभी उसे मेरी याद आएमेरी तरह अपनीहर अनादफ़्न कर आएमेरी ख़ातिर जहाँ से लड़ जाएढूँडे मुझेदीवाना-वार नज़रों सेमहफ़िल में तोकभी तन्हाई मेंक़र्या क़र्या फिरेसहरा सहरा जाएफिरे जंगलों मेंदुनिया केमारा-मारारखे दिल पे हाथशाम-ओ-सहरभरे सर्द आहकभी जो ढूँडने मुझ को समुंदरों के सफ़र पे निकलेचाँद का 'अक्स जब पानी में देखेबे-इख़्तियार चौंकेकभी ख़ुद से लिपटती हवा से पता मेरा वो पूछेन मिलूँ जब इस जहाँ में उसेमुसल्ले पे जा के दर्द अपना सुनाएऔर हिचकियाँ बाँध कर गिड़गिड़ाएफिर उसे अपनी हर बे-रुख़ी याद आएतड़प तड़प के वो नाम मेरा दोहराएशायदकभी ऐसा हो जाए
ख़ैर का दर्स हम तकपहाड़ों में बहते हुए पानियों में से होता हुआएक ख़ामोश लम्हे में मिलता रहाना-ख़ुदा अपनी कश्ती का चप्पू पकड़ते हुएगिड़गिड़ाते हुए उस ख़ुदा सेज़मान-ओ-मकाँ के सफ़र तकका इक रास्ता चाहता हैऐसे रस्तों की ख़ैरजिन पे चलते हुए सब के सबबे-ख़तर हैं और उन के क़दम डगमगाते नहींउन परिंदों की ख़ैरघोंसलों में जो तेज़ आंधियों में कभी फड़फड़ाते नहींउन बुज़ुर्गों की ख़ैरजो मुसीबत में भी विर्द-ए-रब्ब-ए-त'आला से ग़ाफ़िल नहींउन मकानों की ख़ैरजिन में रौशन दिये आख़िरी साँस लेते हुएबुझ गएख़ैर सय्यारों कीजो ख़ुदा के बताए हुए रास्तों पर सफ़र करते करते नहीं थक रहेऐसी बहनों की ख़ैरजिन की 'इज़्ज़त को वहशी उड़ा ले गएऐसी माओं की ख़ैरअपने बच्चों को जो ख़ैर का दर्स देती रहींजाने वालों की ख़ैर आने वालों की ख़ैरसब ज़मानों की ख़ैरमुस्कुराते हुए ऐसे लोगों की ख़ैरजिन के दिल ग़म की दहशत से लर्ज़ां गएउन सितारों की ख़ैरगुम-शुदा क़ाफ़िलों को जो रस्ते बताते हुएबुझ गएचाक पर रक्खे ऐसे वजूदों की ख़ैरअपने ख़ालिक़ की ख़्वाहिश पेजैसे बनाए गए बन गएमैं कहाँ तक इज़ाला करूँऐसी रूहों की ख़ैरजो ख़ुदा से त'अल्लुक़ निभाते हुएअपनी परवाज़ से थक के गिरती नहीं
तुम किसी शजर को भीयूँ फ़ुज़ूल मत काटोइस की अहमिय्यत क्या है काश जान जाओ तोइस को तुम उगाओगेसींच कर लहू से भीक्यूँकि इस के दम से ही इस जहाँ में रौनक़ हैये ख़ुदा-ए-बर्तर की इक हसीन ने'मत हैऔर इन के दम से हीसाँस लेने वालों की ज़िंदगी सलामत हैये अगर नहीं होते कोई भी नहीं जीताइस लिए सभी मिल कर बारगाह-ए-यज़्दाँ मेंक्यों न गिड़गिड़ाएँ हमफूल फल अनाजों सेलहलहाते खेतों को और इन दरख़्तों कोऐ ख़ुदा सलामत रख
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books