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नज़्म
यहाँ दीवार पर मैं ने चमकता चाँद छोड़ा था
हँसी के मोतियों की एक माला थी जो तुम ने गिफ़्ट में दी थी
सीमा ग़ज़ल
नज़्म
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर में जीते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मुज़्तरिब है तू कि तेरा दिल नहीं दाना-ए-राज़
गुफ़्त रूमी हर बना-ए-कुहना कि-आबादाँ कुनंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये बात बात पे क़ानून ओ ज़ाब्ते की गिरफ़्त
ये ज़िल्लतें ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ये मजबूरी सी मजबूरी ये लाचारी सी लाचारी
कि उस के गीत भी दिल खोल कर मैं गा नहीं सकता