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नज़्म
घिरा हुआ है अब्र माहताब ढूँढता हूँ मैं
जिन्हें सहर निगल गई, वो ख़्वाब ढूँढता हूँ मैं
आमिर उस्मानी
नज़्म
वो मेरी जुरअतों पर बे-नियाज़ी की सज़ा देना
हवस की ज़ुल्मतों पर नाज़ की बिजली गिरा देना
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
गिरा दे क़स्र-ए-तमद्दुन कि इक फ़रेब है ये
उठा दे रस्म-ए-मोहब्बत अज़ाब पैदा कर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इक बर्क़-ए-अदा ख़िर्मन-ए-हस्ती पे गिरा कर
नज़रों को मिरी तूर का अफ़्साना बना दे
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
हुर्रियत-ए-आदम की रह-ए-सख़्त के रह-गीर
ख़ातिर में नहीं लाते ख़याल-ए-दम-ए-ताज़ीर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अपनी फ़ितरत की बुलंदी पे मुझे नाज़ है कब
हाँ तिरी पस्त-निगाही से गिला है मुझ को