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नज़्म
बू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमन
क्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमन
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तेरा ग़म्माज़ बना ख़ुद तिरा अंदाज़-ए-ख़िराम
दिल न सँभला था तो क़दमों को सँभाला होता
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
वो माँ जो गुफ़्तुगू की रौ में सुन के मेरी बड़
कभी जो प्यार से मुझ को न कह सकी घामड़
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
बहार की ख़ुश-गवार हिद्दत से रात गुलनार हो रही थी
रुपहले सपने से आसमाँ पर सहाब बन कर बिखर गए थे