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नज़्म
वो भी अब नक़्द-ए-हुकूमत को परखते हैं ज़रूर
जिन को अब तक भी तमीज़-ए-गुहर-ओ-संग नहीं
शिबली नोमानी
नज़्म
कहीं तो कारवान-ए-दर्द की मंज़िल ठहर जाए
किनारे आ लगे उम्र-ए-रवाँ या दिल ठहर जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
गुबार-ए-रहगुज़ार-ए-दहर में आलूदगी कब तक
मिरे ज़र्रीं तसव्वुर को बिसात-ए-कहकशाँ दे दे
मोहम्मद सादिक़ ज़िया
नज़्म
ज़मीं कि पाँव तले कोई फ़र्श-ए-ज़र हो जैसे
फ़लक कि सर पर रिदा-ए-आब-ए-गुहर हो जैसे