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नज़्म
शाहिद-ए-मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ पर
ख़ंदा-ज़न है ग़ुंचा-ए-दिल्ली गुल-ए-शीराज़ पर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ग़ुंचा-ए-दिल मर्द का रोज़-ए-अज़ल जब खुल चुका
जिस क़दर तक़दीर में लिक्खा हुआ था मिल चुका
जोश मलीहाबादी
नज़्म
अब छोड़ भी अफ़्सुर्दगी अपनी दिल-ए-नादाँ
अब फूल भी हो खिल के तू ऐ ग़ुंचा-ए-दिल-तंग
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
चमन में जिस से है इज़्न-ए-शगुफ़्त-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुल
गुदाज़ क़ल्ब वो बख़्शा है तुझ को क़ुदरत ने
मसूद अख़्तर जमाल
नज़्म
रो रहे हैं ग़ुन्चा-ओ-बर्ग-ओ-शजर तेरे बग़ैर
बाग़ की सारी फ़ज़ा है नौहागर तेरे बग़ैर
जौहर निज़ामी
नज़्म
ग़ुंचा-ए-अहद-ए-तरब ही मिल चुका अब ख़ाक में
ख़ाक-ए-गुलशन अब गुल-ए-तर बन के इतराई तो क्या
जोश मलीहाबादी
नज़्म
वक़्त की बात है हर ग़ुंचा-ए-सर-बस्ता मगर
वक़्त क्या चीज़ है पैमाना-ए-बे-साख़्ता है