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नज़्म
ग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैं
शोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो शिद्दत-ए-बयाँ हो कि हो जुरअत-ए-बयान-ए-हक़
गुस्ताख़ इतनी हो गई मेरी ज़बाँ कभी कभी
अशरफ़ बाक़री
नज़्म
मैं टेढ़ी पस्ली का गुस्ताख़ जनम हूँ
जिस के हल्क़ों में बद-तहज़ीब चीख़ों का हुजूम
सिदरा सहर इमरान
नज़्म
तू जो आती है तो ख़ुशबूएँ बिखर जाती हैं
तू जो गुज़रे तो ये गुस्ताख़ चराग़ों की लवें