aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "hal"
शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँजगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगीवो किन ख़्वाबों से जाने आश्ना ना-आश्ना होगीतुम्हारे दिल के इस दुनिया से कैसे सिलसिले होंगेतुम्हें कैसे गुमाँ होंगे तुम्हें कैसे गिले होंगेतुम्हारी सुब्ह जाने किन ख़यालों से नहाती होतुम्हारी शाम जाने किन मलालों से निभाती होन जाने कौन दोशीज़ा तुम्हारी ज़िंदगी होगीन जाने उस की क्या बायसतगी शाइस्तगी होगीउसे तुम फ़ोन करते और ख़त लिखते रहे होगेन जाने तुम ने कितनी कम ग़लत उर्दू लिखी होगीये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा हैये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा हैवो हँसती हो तो शायद तुम न रह पाते हो हालों मेंगढ़ा नन्हा सा पड़ जाता हो शायद उस के गालों मेंगुमाँ ये है तुम्हारी भी रसाई ना-रसाई होवो आई हो तुम्हारे पास लेकिन आ न पाई होवो शायद माइदे की गंद बिरयानी न खाती होवो नान-ए-बे-ख़मीर-ए-मैदा कम-तर ही चबाती होवो दोशीज़ा भी शायद दास्तानों की हो दिल-दादाउसे मालूम होगा 'ज़ाल' था 'सोहराब' का दादातहमतन यानी 'रुस्तम' था गिरामी 'साम' का वारिसगिरामी 'साम' था सुल्ब-ए-नर-ए-'मानी' का ख़ुश-ज़ादा(ये मेरी एक ख़्वाहिश है जो मुश्किल है)वो 'नज्म'-आफ़ंदि-ए-मरहूम को तो जानती होगीवो नौहों के अदब का तर्ज़ तो पहचानती होगीउसे कद होगी शायद उन सभी से जो लपाड़ी होंन होंगे ख़्वाब उस का जो गवय्ये और खिलाड़ी हों
ख़ून अपना हो या पराया होनस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िरजंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब मेंअम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर
आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़मानावो बाग़ की बहारें वो सब का चहचहानाआज़ादियाँ कहाँ वो अब अपने घोंसले कीअपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जानालगती है चोट दिल पर आता है याद जिस दमशबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुरानावो प्यारी प्यारी सूरत वो कामनी सी मूरतआबाद जिस के दम से था मेरा आशियानाआती नहीं सदाएँ उस की मिरे क़फ़स मेंहोती मिरी रिहाई ऐ काश मेरे बस में
गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलींउदास तुम भी हो यारो उदास हम भी हैंफ़क़त तुम्हीं को नहीं रंज-ए-चाक-दामानीकि सच कहें तो दरीदा-लिबास हम भी हैं
जवान रात के सीने पे दूधिया आँचलमचल रहा है किसी ख़ाब-ए-मर्मरीं की तरह
तुझ से बिछड़ कर भी ज़िंदा थामर मर कर ये ज़हर पिया हैचुप रहना आसान नहीं थाबरसों दिल का ख़ून किया हैजो कुछ गुज़री जैसी गुज़रीतुझ को कब इल्ज़ाम दिया हैअपने हाल पे ख़ुद रोया हूँख़ुद ही अपना चाक सिया हैकितनी जाँकाही से मैं नेतुझ को दिल से महव किया हैसन्नाटे की झील में तू नेफिर क्यूँ पत्थर फेंक दिया है
तुम्हारी याद मिरे दिल का दाग़ है लेकिनसफ़र के वक़्त तो बे-तरह याद आती होबरस बरस की हो आदत का जब हिसाब तो फिर
ऐ अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ में पैदा तिरी आयातहक़ ये है कि है ज़िंदा ओ पाइंदा तिरी ज़ातमैं कैसे समझता कि तू है या कि नहीं हैहर दम मुतग़य्यर थे ख़िरद के नज़रियातमहरम नहीं फ़ितरत के सुरूद-ए-अज़ली सेबीना-ए-कवाकिब हो कि दाना-ए-नबातातआज आँख ने देखा तो वो 'आलम हुआ साबितमैं जिस को समझता था कलीसा के ख़ुराफ़ातहम बंद-ए-शब-ओ-रोज़ में जकड़े हुए बंदेतू ख़ालिक़-ए-आसार-ओ-निगारंदा-ए-आनातइक बात अगर मुझ को इजाज़त हो तो पूछूँहल कर न सके जिस को हकीमों के मक़ालातजब तक मैं जिया ख़ेमा-ए-अफ़्लाक के नीचेकाँटे की तरह दिल में खटकती रही ये बातगुफ़्तार के उस्लूब पे क़ाबू नहीं रहताजब रूह के अंदर मुतलातुम हों ख़यालातवो कौन सा आदम है कि तू जिस का है मा'बूदवो आदम-ए-ख़ाकी कि जो है ज़ेर-ए-समावातमशरिक़ के ख़ुदावंद सफ़ेदान-ए-रंगीमग़रिब के ख़ुदावंद दरख़्शंदा फ़िलिज़्ज़ातयूरोप में बहुत रौशनी-ए-इल्म-ओ-हुनर हैहक़ ये है कि बे-चश्मा-ए-हैवाँ है ये ज़ुल्मातरानाई-ए-तामीर में रौनक़ में सफ़ा मेंगिरजों से कहीं बढ़ के हैं बैंकों की इमारातज़ाहिर में तिजारत है हक़ीक़त में जुआ हैसूद एक का लाखों के लिए मर्ग-ए-मुफ़ाजातये 'इल्म ये हिकमत ये तदब्बुर ये हुकूमतपीते हैं लहू देते हैं तालीम-ए-मुसावातबेकारी ओ 'उर्यानी ओ मय-ख़्वारी ओ इफ़्लासक्या कम हैं फ़रंगी मदनियत की फ़ुतूहातवो क़ौम कि फ़ैज़ान-ए-समावी से हो महरूमहद उस के कमालात की है बर्क़ ओ बुख़ारातहै दिल के लिए मौत मशीनों की हुकूमतएहसास-ए-मुरव्वत को कुचल देते हैं आलातआसार तो कुछ कुछ नज़र आते हैं कि आख़िरतदबीर को तक़दीर के शातिर ने किया मातमय-ख़ाना की बुनियाद में आया है तज़लज़ुलबैठे हैं इसी फ़िक्र में पीरान-ए-ख़राबातचेहरों पे जो सुर्ख़ी नज़र आती है सर-ए-शामया ग़ाज़ा है या साग़र ओ मीना की करामाततू क़ादिर ओ 'आदिल है मगर तेरे जहाँ मेंहैं तल्ख़ बहुत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ातकब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीनादुनिया है तिरी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-मुकाफ़ात
ओ देस से आने वाला है बताओ देस से आने वाले बताकिस हाल में हैं यारान-ए-वतनआवारा-ए-ग़ुर्बत को भी सुनाकिस रंग में है कनआन-ए-वतनवो बाग़-ए-वतन फ़िरदौस-ए-वतनवो सर्व-ए-वतन रैहान-ए-वतनओ देस से आने वाले बता
इस क़दर भी नहीं मुझे मा'लूमकिस मोहल्ले में है मकाँ तेराकौन सी शाख़-ए-गुल पे रक़्साँ हैरश्क-ए-फ़िरदौस आशियाँ तेराजाने किन वादियों में उतरा हैग़ैरत-ए-हुस्न कारवाँ तेराकिस से पूछूँगा मैं ख़बर तेरीकौन बतलाएगा निशाँ तेरातेरी रुस्वाइयों से डरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँहाल-ए-दिल भी न कह सका गरचेतू रही मुद्दतों क़रीब मिरेकुछ तिरी अज़्मतों का डर भी थाकुछ ख़यालात थे अजीब मिरेआख़िर-ए-कार वो घड़ी आईबार-वर हो गए रक़ीब मिरेतू मुझे छोड़ कर चली भी गईख़ैर क़िस्मत मिरी नसीब मिरेअब मैं क्यूँ तुझ को याद करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँगो ज़माना तिरी मोहब्बत काएक भूली हुई कहानी हैतेरे कूचे में उम्र-भर न गएसारी दुनिया की ख़ाक छानी हैलज़्ज़त-ए-वस्ल हो कि ज़ख़्म-ए-फ़िराक़जो भी हो तेरी मेहरबानी हैकिस तमन्ना से तुझ को चाहा थाकिस मोहब्बत से हार मानी हैअपनी क़िस्मत पे नाज़ करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँअश्क पलकों पे आ नहीं सकतेदिल में है तेरी आबरू अब भीतुझ से रौशन है काएनात मिरीतेरे जल्वे हैं चार-सू अब भीअपने ग़म-ख़ाना-ए-तख़य्युल मेंतुझ से होती है गुफ़्तुगू अब भीतुझ को वीराना-ए-तसव्वुर मेंदेख लेता हूँ रू-ब-रू अब भीअब भी मैं तुझ को प्यार करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँआज भी कार-ज़ार-ए-हस्ती मेंतू अगर एक बार मिल जाएकिसी महफ़िल में सामना हो जाएया सर-ए-रहगुज़ार मिल जाएइक नज़र देख ले मोहब्बत सेएक लम्हे का प्यार मिल जाएआरज़ूओं को चैन आ जाएहसरतों को क़रार मिल जाएजाने क्या क्या ख़याल करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँआज मैं ऐसे मक़ाम पर हूँ जहाँरसन-ओ-दार की बुलंदी हैमेरे अशआ'र की लताफ़त मेंतेरे किरदार की बुलंदी हैतेरी मजबूरियों की अज़्मत हैमेरे ईसार की बुलंदी हैसब तिरे दर्द की इनायत हैसब तिरे प्यार की बुलंदी हैतेरे ग़म से निबाह करता हैजब तिरे शहर से गुज़रता हूँतुझ से कोई गिला नहीं मुझ कोमैं तुझे बेवफ़ा नहीं कहतातेरा मिलना ख़याल-ओ-ख़्वाब हुआफिर भी ना-आश्ना नहीं कहतावो जो कहता था मुझ को आवारामैं उसे भी बुरा नहीं कहतावर्ना इक बे-नवा मोहब्बत मेंदिल के लुटने पे क्या नहीं कहतामैं तो मुश्किल से आह भरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँकोई पुर्सान-ए-हाल हो तो कहूँकैसी आँधी चली है तेरे बा'ददिन गुज़ारा है किस तरह मैं नेरात कैसे ढली है तेरे बा'दशम-ए-उम्मीद सरसर-ए-ग़म मेंकिस बहाने जली है तेरे बा'दजिस में कोई मकीं न रहता होदिल वो सूनी गली है तेरे बा'दरोज़ जीता हूँ रोज़ मरता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँलेकिन ऐ साकिन-ए-हरीम-ए-ख़यालयाद है दौर-ए-कैफ़-ओ-कम कि नहींक्या कभी तेरे दिल पे गुज़रा हैमेरी महरूमियों का ग़म कि नहींमेरी बर्बादियों का सुन कर हालआँख तेरी हुई है नम कि नहींऔर इस कार-ज़ार-ए-हस्ती मेंफिर कभी मिल सकेंगे हम कि नहींडरते डरते सवाल करता हूँजब तिरे शहर से गुज़रता हूँ
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
दुनिया-भर से दूर ये नगरीनगरी दुनिया-भर से निरालीअंदर अरमानों का मेलाबाहर से देखो तो ख़ालीहम हैं इस कुटिया के जोगीहम हैं इस नगरी के वालीहम ने तज रक्खा है ज़मानातुम आना तो तन्हा आना
आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मोहब्बत मनाएँ हम!आती नहीं कहीं से दिल-ए-ज़िंदा की सदासूने पड़े हैं कूचा ओ बाज़ार इश्क़ केहै शम-ए-अंजुमन का नया हुस्न जाँ-गुदाज़शायद नहीं रहे वो पतिंगों के वलवलेताज़ा न रह सकेंगी रिवायात-ए-दश्त-ओ-दरवो फ़ित्ना-सर गए जिन्हें काँटे अज़ीज़ थे
उस ने इतनी किताबें चाट डालींकि उस की औरत के पैर काग़ज़ की तरह हो गएवो रोज़ काग़ज़ पे अपना चेहरा लिखता और गंदा होताउस की औरत जो ख़ामोशी काढ़े बैठी थीकाग़ज़ों के भूँकने पर सारतर के पास गईतुम रैम्बो और फ़्राइड से भी मिल आए हो क्यासैफ़ू मेरी सैफ़ू मीराबाई की तरह मत बोलोमैं समझ गई अब उस की आँखेंकीट्स की आँखें हुई जाती हैंमैं जो सोहनी का घड़ा उठाए हुए थीअपना नाम लैला बता चुकी थीमैं ने कहालैला मजमे की बातें मेरे सामने मत दोहराया करोतन्हाई भी कोई चीज़ होती हैशेक्सपियर के ड्रामों से चुन चुन कर उस ने ठुमके लगाएमुझे तन्हा देख करसारतर फ़्राइड के कमरे में चला गयावो अपनी थ्योरी से गिर गिर पड़तामैं समझ गई उस की किताब कितनी हैलेकिन बहर हाल सारतर थाऔर कल को मजमे में भी मिलना थामैं ने भीड़ की तरफ़ इशारा किया तो बोलाइतने सारे सार्त्रों से मिल कर तुम्हें क्या करना हैअगर ज़ियादा ज़िद करती हो तो अपने वारिस 'शाह'हीर सय्याल के कमरों में चले चलते हैंसारतर से इस्तिआरा मिलते हीमैं ने एक तन्क़ीदी नशिस्त रक्खीमैं ने आधा कमरा भी बड़ी मुश्किल से हासिल किया थासो पहले आधे फ़्राइड को बुलायाफिर आधे रैम्बो को बुलायाआधी आधी बात पूछनी शुरूअ कीजॉन डन क्या कर रहा हैसैकेंड हैंड शाइरों से नजात चाहता हैचोरों से सख़्त नालाँ हैदाँते इस वक़्त कहाँ हैवो जहन्नम से भी फ़रार हो चुका हैउस को शुबहा थावो ख़्वाजा-सराओं से ज़ियादा देर मुक़ाबला नहीं कर सकताअपने पस-मंज़र मेंएक कुत्ता मुसलसल भूँकने के लिए छोड़ गया हैइस कुत्ते की ख़सलत क्या हैबियातर्चे की याद में भूँक रहा हैतुम्हारा तसव्वुर क्या कहता हैसार्त्रों की तसव्वुर के लिहाज़ सेअब उस का रुख़ गोएटे के घर की तरफ़ हो गया है
ऐ देखने वालोइस हुस्न को देखोइस राज़ को समझोये नक़्श-ए-ख़यालीये फ़िक्रत-ए-आलीये पैकर-ए-तनवीरये कृष्ण की तस्वीरमअनी है कि सूरतसनअ'त है कि फ़ितरतज़ाहिर है कि मस्तूरनज़दीक है या दूरये नार है या नूरदुनिया से निरालाये बाँसुरी वालागोकुल का ग्वालाहै सेहर कि एजाज़खुलता ही नहीं राज़क्या शान है वल्लाहक्या आन है वल्लाहहैरान हूँ क्या हैइक शान-ए-ख़ुदा हैबुत-ख़ाने के अंदरख़ुद हुस्न का बुत-गरबुत बन गया आ करवो तुर्फ़ा नज़्ज़ारेयाद आ गए सारेजमुना के किनारेसब्ज़े का लहकनाफूलों का महकनाघनघोर घटाएँसरमस्त हवाएँमासूम उमंगेंउल्फ़त की तरंगेंवो गोपियों के साथहाथों में दिए हाथरक़्साँ हुआ ब्रिजनाथबंसी में जो लय हैनश्शा है न मय हैकुछ और ही शय हैइक रूह है रक़्साँइक कैफ़ है लर्ज़ांएक अक़्ल है मय-नोशइक होश है मदहोशइक ख़ंदा है सय्यालइक गिर्या है ख़ुश-हालइक इश्क़ है मग़रूरइक हुस्न है मजबूरइक सेहर है मसहूरदरबार में तन्हालाचार है कृष्णाआ श्याम इधर आसब अहल-ए-ख़ुसूमतहैं दर पए इज़्ज़तये राज दुलारेबुज़दिल हुए सारेपर्दा न हो ताराजबेकस की रहे लाजआ जा मेरे कालेभारत के उजालेदामन में छुपा लेवो हो गई अन-बनवो गर्म हुआ रनग़ालिब है दुर्योधनवो आ गए जगदीशवो मिट गई तशवीशअर्जुन को बुलायाउपदेश सुनायाग़म-ज़ाद का ग़म क्याउस्ताद का ग़म क्यालो हो गई तदबीरलो बन गई तक़दीरलो चल गई शमशीरसीरत है अदू-सोज़सूरत नज़र-अफ़रोज़दिल कैफ़ियत-अंदोज़ग़ुस्से में जो आ जाएबिजली ही गिरा जाएऔर लुत्फ़ पर आएतो घर भी लुटा जाएपरियों में है गुलफ़ामराधा के लिए श्यामबलराम का भय्यामथुरा का बसय्याबिंद्रा में कन्हैय्याबन हो गए वीराँबर्बाद गुलिस्ताँसखियाँ हैं परेशाँजमुना का किनारासुनसान है सारातूफ़ान हैं ख़ामोशमौजों में नहीं जोशलौ तुझ से लगी हैहसरत ही यही हैऐ हिन्द के राजाइक बार फिर आ जादुख दर्द मिटा जाअब्र और हवा सेबुलबुल की सदा सेफूलों की ज़िया सेजादू-असरी गुमशोरीदा-सरी गुमहाँ तेरी जुदाईमथुरा को न भाईतू आए तो शान आएतू आए तो जान आएआना न अकेलेहों साथ वो मेलेसखियों के झमेले
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नामराह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाममंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ामदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलामइज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भीदेखा हमें उदास तो ग़म होगा और भीदिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहालख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़यालदेखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हालसकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलालतन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग हैगोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग हैक्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाहनूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाहजुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आहली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राहचेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगाहर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगाआख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुलाअफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुलाइक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुलावा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुलादर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से 'अयाँ हुआरो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँमैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँसब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँलेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँकिस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँजोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँदुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीदअंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीदअंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेदसोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीदलिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्तेफैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्तेलेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनमहोते न मेरी जान को सामान ये बहमडसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशमतुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कममैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज कोतुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज कोकिन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-सालदेखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहालपूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमालआफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बालछटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्तेक्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्तेऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़रघर जिन के बे-चराग़ रहे आह 'उम्र भररहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समरये जा-ए-सब्र थी कि दु'आ में नहीं असरलेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गयाफल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गयासरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाहमंजधार में जो यूँ मिरी कश्ती हुई तबाहआती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राहअब याँ से कूच हो तो 'अदम में मिले पनाहतक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करेआसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करेसुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाएनाशाद हम को देख के माँ और मर न जाएफिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूरमायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूरसदमा ये शाक़ 'आलम-ए-पीरी में है ज़रूरलेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूरशायद ख़िज़ाँ से शक्ल 'अयाँ हो बहार कीकुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार कीये जा'ल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शरहोना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सरअस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़रक्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गरख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहींमंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहींराहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशारवाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगारतुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गारमातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवारसख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहींदुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
जिस के माथे के पसीने से पए-इज़्ज़-ओ-वक़ारकरती है दरयूज़ा-ए-ताबिश कुलाह-ए-ताजदार
जहाँ रौशनी है खंडर खंडरयहाँ क़ुमक़ुमों से जवान थेजहाँ च्यूंटियाँ हुईं ख़ेमा-ज़नयहाँ जुगनूओं के मकान थे
जीने का हक़ सामराज ने छीन लियाउट्ठो मरने का हक़ इस्तिमाल करोज़िल्लत के जीने से मरना बेहतर हैमिट जाओ या क़स्र-ए-सितम पामाल करो
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