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नज़्म
वो सब वफ़ादारियाँ कि जिन पर लहू के वा'दे हलफ़ हुए थे
वो आज से मस्लहत की घड़ियाँ शुमार होंगी
परवीन शाकिर
नज़्म
हलफ़ उठाने की रस्म से बे-नियाज़ लम्हे
तमाम मफ़्लूज अद्ल-गाहों की मस्लहत-ए-केश-बे-ज़बानी
हसन हमीदी
नज़्म
मिली है जब भी उन्हें वज़ारत असेंबली हो गई मुअत्तल
हमारी मिल्लत के रहनुमा तो हलफ़ उठाने में घिस गए हैं
खालिद इरफ़ान
नज़्म
हदफ़ होंगे तुम्हारा कौन तुम किस के हदफ़ होगे
न जाने वक़्त की पैकार में तुम किस तरफ़ होगे
जौन एलिया
नज़्म
मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगे
जब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगे