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नज़्म
जिस में एक दूसरे से हम-किनार तैरते रहे
मुहीत जिस तरह हो दाएरे के गिर्द हल्क़ा-ज़न
नून मीम राशिद
नज़्म
ठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में
'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
रात भर मैं ने आँखें भिगोई हैं कूज़ों में और सुब्ह-दम
हल्क़ को तर किया आँसुओं से बहुत