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नज़्म
लड़कपन की रफ़ीक़ ऐ हम-नवा-ए-नग़मा-ए-तिफ़ली
हमारी ग्यारह साला ज़िंदगी की दिल-नशीं वादी
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
ऐ बाग़बाँ हो तुझ को तख़्त-ए-चमन मुबारक
मुझ को वो हम-नवा दे वो मेरा घोंसला दे
ख़ुशी मोहम्मद नाज़िर
नज़्म
उस को नफ़’-ओ-ज़रर से मुबर्रा किया
मैं कि इसहाक़-ओ-या'क़ूब का हम-नवा हर नबी के तयक़्क़ुन में ढलता रहा
अब्दुर्राहमान वासिफ़
नज़्म
मोर बोला ऐ मिरी हम-रक़्स मेरी हम-नवा
तू नहीं वाक़िफ़ कि मैं घूमा फिरा हूँ किस क़दर
बासिर सुल्तान काज़मी
नज़्म
और कोई हम-नवा मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
गुनगुनाती 'इशरतें दे कर दिल-ए-ग़मनाक को
हम-नवा अपना बना कर जुरअत-ए-बे-बाक को