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अहिंसा की पहली सुनहरी किरन

असर लखनवी

अहिंसा की पहली सुनहरी किरन

असर लखनवी

MORE BYअसर लखनवी

    ख़िरामाँ ख़िरामाँ चली रही है

    निगाहों पे इक हुस्न से छा रही है

    हर इक गाम पर नूर बिखरा रही है

    उफ़ुक़ पर वो परचम को लहरा रही है

    अहिंसा की पहली सुनहरी किरन

    मिली कीमिया-गर को आख़िर वो बूटी

    कि जिस से अलाएक की ज़ंजीर टूटी

    शब-ए-तार में जैसे महताब छूटी

    तजल्ली के पर्दे से फूटी वो फूटी

    अहिंसा की पहली सुनहरी किरन

    नया रूप हस्ती ने पैदा किया है

    हर इक दिल में इक वलवला भर रहा है

    मुसीबत का एहसास हिम्मत-फ़ज़ा है

    कि अर्बाब-ए-बीनिश की अब रहनुमा है

    अहिंसा की पहली सुनहरी किरन

    ज़मीन-ओ-ज़माँ हम-नवा हो रहे हैं

    कि दिल वाले तुख़्म-ए-वफ़ा बो रहे हैं

    वही पा रहे हैं जो कुछ खो रहे हैं

    जगाएगी उन को भी जो सो रहे हैं

    अहिंसा की पहली सुनहरी किरन

    स्रोत:

    Urdu Me.n Qaumi Shayri ke 100 Saal (Pg. E-344 B-349)

      • संस्करण: 1959
      • प्रकाशक: प्रकाशन शाखा महकमा-ए-इत्तिलाआत, यूपी
      • प्रकाशन वर्ष: 1959

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