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नज़्म
ढूँढता हूँ तीसरे के दाख़िले को मदरसा
जा के चौथे ने जो हम-साए से झगड़ा कर लिया
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
वो चे-मी-गोईयाँ इक एक हम-साए की सहते हैं
रुख़-ए-बरहम के आगे टी-वी रख कर अब ये कहते हैं