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नज़्म
ये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा है
ये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा है
जौन एलिया
नज़्म
ख़बर देती है तहरीक-ए-हवा तबदील-ए-मौसम की
खिलेंगे और ही गुल ज़मज़मे बुलबुल के कम होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
मुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैं
इसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
पेश-रौ शाही थी फिर हिज़-हाईनेस फिर अहल-ए-जाह
बअ'द इस के शैख़ साहब उन के पीछे ख़ाकसार
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
जहाँ में हर तरफ़ है इल्म ही की गर्म-बाज़ारी
ज़मीं से आसमाँ तक बस इसी का फ़ैज़ है जारी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
बशर नवाज़
नज़्म
खिलखिलाते आईकोन के साथ उस का मैसेज नुमूदार हुआ
अरे लड़की तुम में ज़रा हिस्स-ए-मिज़ाह नहीं है
ज़ेहरा अलवी
नज़्म
पत्थरों की इसी अंजुमन का मुग़न्नी हूँ मैं
और बेदर्द बे-हिस सितमगार पत्थर सुनेंगे कभी
वहीद अख़्तर
नज़्म
जिस ने सीखा ही नहीं अब्र-ए-बहारी का ख़िराम
रात तारीक है और मैं हूँ वो इक शमबू-ए-हज़ीं