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नज़्म
देख मिरी जाँ कह गए बाहू कौन दिलों की जाने 'हू'
बस्ती बस्ती सहरा सहरा लाखों करें दिवाने 'हू'
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मैं खटकता हूँ दिल-ए-यज़्दाँ में काँटे की तरह
तू फ़क़त अल्लाह-हू अल्लाह-हू अल्लाह-हू
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
गर्मी-ए-आरज़ू फ़िराक़! शोरिश-ए-हाव-ओ-हू फ़िराक़!
मौज की जुस्तुजू फ़िराक़! क़तरे की आबरू फ़िराक़!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
क्या हुदहुदों की हक़ हक़ क्या फ़ाख़्तों की हू-हू
सब रट रहे हैं तुझ को क्या पँख क्या पखेरू
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जब बरखा की रुत आती है जब काली घटाएँ उठती हैं
जिस वक़्त कि रिंदों के दिल से हू-हक़ की सदाएँ उठती हैं
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
थर-थर का ज़ोर उखाड़ा हो बजती हो सब की बत्तीसी
हो शोर फफू हू-हू का और धूम हो सी-सी सी-सी की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़न
मगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतन