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नज़्म
जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन हो न अगर दिल में निहाँ
ऐसे जीने से तो मरने का ख़याल अच्छा है
आफ़ताब रईस पानीपती
नज़्म
वो तही-दस्त हैं जो ज़ोर न ज़र रखते हैं
जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन दिल में मगर रखते हैं
सरदार नौबहार सिंह साबिर टोहानी
नज़्म
कोई बताए अज़्मत-ए-ख़ाक-ए-वतन कहाँ है अब
कोई बताए ग़ैरत-ए-अहल-ए-वतन को क्या हुआ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन दिल में निहाँ रखते हैं
मिस्ल-ए-ख़ूँ जोश ये रग रग में रवाँ रखते हैं
बर्क़ देहलवी
नज़्म
हर तरफ़ हो जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन शो'ला-फ़िशाँ
गुलख़न-ए-सोज़ाँ नज़र आए यहाँ का हर जवाँ
टीका राम सुख़न
नज़्म
बादा-ए-हुब्ब-ए-वतन के जाम भर भर कर पिला
तिश्नगी प्यासों की यूँ साक़ी बुझानी चाहिए
बाबू मुर्ली धर
नज़्म
हुब्ब-ए-वतन को जुज़्व-ए-ईमाँ कहा गया है
वाइज़ समझ के कीजो तकफ़ीर गोखले की
ज़ाहिदा ख़ातून शरवानिया
नज़्म
तिरे अशआ'र ने रंग-ए-क़ुबूल-ए-आम पाया है
जहाँ में तू ने अपनी शेरियत से नाम पाया है