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नज़्म
मगर क्या कीजिए जब फ़ैसला ये है मशिय्यत का
कि मैं फ़ितरत की आँखों से गिरूँ अश्क-ए-रवाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
खुला है तुझ पे अभी आह राज़-ए-इश्क़ कहाँ
तू बुल-हवस है, तुझे इम्तियाज़-ए-इश्क़ कहाँ
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
जो करेगा इम्तियाज़-ए-रंग-ओ-ख़ूँ मिट जाएगा
तुर्क-ए-ख़र्गाही हो या आराबी-ए-वाला-गुहर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सर-ए-मक़्तल चलो बे-ज़हमत-ए-तक़सीर बिस्मिल्लाह
हुई फिर इमतिहान-ए-इशक़ की तदबीर बिस्मिल्लाह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इम्तियाज़-ए-तालिब-ओ-मतलूब तक बाक़ी नहीं
गर्दिश-ए-दौराँ से ये लम्हा जुदा है आज-कल
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
जो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत में
ग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहना
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मिटा कर इम्तियाज़-ए-नेक-ओ-बद सब एक हो जाएँ
ख़ुदा भी एक है बंदे भी उस के एक हो जाएँ
क़ैसर अमरावतवी
नज़्म
वहाँ परियाँ मोहब्बत के ख़ुदा के गीत गाती हैं
कनार-ए-आब-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ बाहम सैर करते हैं
नज़ीर मिर्ज़ा बर्लास
नज़्म
देखिए देते हैं किस किस को सदा मेरे बाद
'कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़'
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
उस से पोशीदा नहीं हैं राज़हा-ए-हुस्न-ओ-इश्क़
तर्जुमाँ है अहल-ए-उल्फ़त का वो सिर्र-ए-दिल-बराँ
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
फ़िरदौस-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ है दामान-ए-लखनऊ
आँखों में बस रहे हैं ग़ज़ालान-ए-लखनऊ