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नज़्म
ख़ैर अब हम मुतमइन यूँ हैं कि जान-ए-आरज़ू
हम ने कुछ खो भी दिया है और कुछ पाया भी है
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
गवाही जान दे के तू ने दी है हक़ की ज़ात पर
चलेंगे क़ाफ़िले तिरे निशान-ए-पा को देख कर
एस. ए. रहमान
नज़्म
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा
यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है