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नज़्म
इक भिकारी था उसी पहली किरन का जो लरज़ते हुए आती है जगा देती है
सोए सायों को उठा देती है बेदारी में
मीराजी
नज़्म
जागे हैं इफ़्लास के मारे उठे हैं बे-बस दुखियारे
सीनों में तूफ़ाँ का तलातुम आँखों में बिजली के शरारे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मेरी आँखों में लरज़ता हुआ क़तरा जागा
मेरी आँखों में लरज़ते हुए क़तरे ने किसी झील की सूरत ले ली