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नज़्म
ऐ क़ौम वतन के परवानो लो अपने फ़र्ज़ को पहचानो
अब जेल से ये पैग़ाम हमें भिजवा दिया गाँधी बाबा ने
आफ़ताब रईस पानीपती
नज़्म
छुट्टी की इजाज़त मिलते ही हम जेल के इक क़ैदी की तरह
इस्कूल से बाहर आते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
चाहता हूँ यूँ हो रंगीं पैरहन और सारियाँ
शुस्त-ओ-शू से भी न ज़ाइल हो सकें गुल-कारियाँ
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
इज़हार अपने आप में ज़ाइल हुए तमाम
सिर्फ़ आँख है कि देखती है चाँद निस्फ़ गोल
राजेन्द्र मनचंदा बानी
नज़्म
मरेंगे जान देंगे ग़म सहेंगे जेल जाएँगे
मगर ऐ 'ज़ाहिदा' अब जश्न-ए-आज़ादी मनाएँगे