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नज़्म
फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगे
सीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
जब अज़्म-ओ-अमल अच्छा होगा अच्छा ही नतीजा भी होगा
हम लोग यहाँ हलवा खा कर इक शम्अ' जलाए बैठे हैं
शौकत परदेसी
नज़्म
जलाए... दीदा-ए-बे-ख़्वाब की हर राह दरवाज़े
की दर्ज़ों से निकालेगा... ख़ुदा की मेहरबानी इक
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
जलते रहने से धुआँ बन के मिटा तेरा बदन
तू लगा मुँह को तो ग़ाएब हुई ख़ुशबू-ए-दहन