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नज़्म
घर में बैठे साधू बन कर अब इल्म की माला जपते हैं
ख़रगोशों के पीछे जंगल में कुत्तों को भगाना छोड़ दिया
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
गुलाबी होंट तेरे बस मिरा ही नाम जपते हैं
तिरी मा'सूम चाहत का बड़ा ही मो'तरिफ़ हूँ मैं
शीराज़ सागर
नज़्म
ख़राश-ए-दिल से तुम बे-रिश्ता बे-मक़्दूर ही ठहरो
मिरे जहमीम-ए-ज़ात-ए-ज़ात से तुम दूर ही ठहरो
जौन एलिया
नज़्म
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
और दबे दबे लहजे में कहे तुम ने अब तक बड़े दर्द सहे
तुम तन्हा तन्हा जलते रहे तुम तन्हा तन्हा चलते रहे