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नज़्म
जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन हो न अगर दिल में निहाँ
ऐसे जीने से तो मरने का ख़याल अच्छा है
आफ़ताब रईस पानीपती
नज़्म
क्या ख़ुदा का ख़ौफ़ कैसा जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन
बरसर-ए-पैकार थे आपस में शैख़-ओ-बरहमन
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
वो तही-दस्त हैं जो ज़ोर न ज़र रखते हैं
जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन दिल में मगर रखते हैं
सरदार नौबहार सिंह साबिर टोहानी
नज़्म
दबेगी कब तलक आवाज़-ए-आदम हम भी देखेंगे
रुकेंगे कब तलक जज़्बात-ए-बरहम हम भी देखेंगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन दिल में निहाँ रखते हैं
मिस्ल-ए-ख़ूँ जोश ये रग रग में रवाँ रखते हैं
बर्क़ देहलवी
नज़्म
हर तरफ़ हो जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन शो'ला-फ़िशाँ
गुलख़न-ए-सोज़ाँ नज़र आए यहाँ का हर जवाँ
टीका राम सुख़न
नज़्म
मौज-ए-ख़ूँ जब तक रवाँ रहती है उस का सुर्ख़ रंग
जज़्बा-ए-शौक़-ए-शहादत दर्द, ग़ैज़ ओ ग़म का रंग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जज़्बा-ए-एहसास-ए-ख़ुद्दारी बशर में भर दिया
नाज़ उठाए हिन्द के वो हिन्द का ग़म-ख़्वार था
साहिर होशियारपुरी
नज़्म
हैं सुबूत-ए-जज़्बा-ए-ख़िदमत तिरे सीने के दाग़
फिर हुआ रौशन दकन में तुझ से उर्दू का चराग़
मयकश अकबराबादी
नज़्म
ख़ुद-बख़ुद उठ जाएँगी पाबंदियाँ माहौल की
इक ज़रा हम जज़्बा-ए-वहशत-फ़ज़ा पैदा करें
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
नज़्म
जज़्बा-ए-ख़िदमत को अब बेदार होना चाहिए
सख़्त मेहनत के लिए तय्यार होना चाहिए