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नज़्म
अपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी दे
बर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी दे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
शहर-ए-ख़ूबाँ में गँवाई है जवानी मैं ने
ख़्वाब-गाहों में जगाई है जवानी मैं ने
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखे
नज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौत
मोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
पुख़्ता हो जाए तू है शमशेर-ए-बे-ज़िन्हार तू
हो सदाक़त के लिए जिस दिल में मरने की तड़प
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ून-ए-दिल ओ जिगर से है मेरी नवा की परवरिश
है रग-ए-साज़ में रवाँ साहिब-ए-साज़ का लहू!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जन्नत तिरी पिन्हाँ है तिरे ख़ून-ए-जिगर में
ऐ पैकर-ए-गुल कोशिश-ए-पैहम की जज़ा देख!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुबारक हो कि फिर से हो गया ''डांस'' और ''डिनर'' चालू
ख़लास अहल-ए-नज़र होंगे हुआ दर्द-ए-जिगर चालू