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नज़्म
ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर में जीते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
वो शाम कहाँ वो रात कहाँ वो वक़्त कहाँ वो बात कहाँ
जब मरते थे मरने न दिया अब जीते हैं अब जीने दो
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ऐसी हार तो जीती जा सकती है (शायद हम ने जीत भी ली है)
लेकिन मशरिक़ अपनी रूह के अंदर हार गया है
सलीम अहमद
नज़्म
सिरफ़ हराम की कौड़ी का जिन का है बेवपार
उन्हों ने खाया है इस दिन के वास्ते है उधार