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नज़्म
इंसान वही है ताबिंदा उस राज़ से जिस का सीना है
औरों के लिए तो जीना ही ख़ुद अपने लिए भी जीना है
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
पर इस के ब'अद उस निगाह ने मुझे जिला लिया
निगाह-ए-यार तुझ से अपनी मंज़िलें मैं पाऊँगा
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
जल के ख़ुद सब को जिला देना तिरा पेशा है
छुप के बैठी है अजल जिस में तू वो बेशा है