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नज़्म
और अगर है तो फिर आ तेरे परस्तार हैं हम
जिंस-ए-आज़ादी-ए-इंसाँ के ख़रीदार हैं हम
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कोई जबीं न तिरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
देख हैजान से लर्ज़ां हैं ये आरिज़ की रगें
आज उस जिन्स-ए-गिराँ-बार को अर्ज़ां कर लें
अख़्तर पयामी
नज़्म
शौकत-ए-किसरा ओ शान-ए-जम तो दरबारों में है
जिंस-ए-नायाब-ए-वफ़ा भी तेरे बाज़ारों में है
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
हाथ ख़ाली हों तो ये जिन्स-ए-गिराँ-बार भी हैं
ये जो तुम मुझ से गुरेज़ाँ हो मिरी बात सुनो
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
सलीक़ा इंतिक़ाद-ए-जिंस-ए-हिरफ़त का नहीं हम को
ज़र-ए-ख़ालिस से अबरेशम-नुमा यूरोप ने सन बदला
सय्यद तसलीम हैदर क़मर
नज़्म
तेरी जिंस-ए-इल्म-परवर के ख़रीदारों में थे
जान-ओ-दिल से तेरे जल्वों के परस्तारों में थे