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नज़्म
जौन एलिया
नज़्म
ये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गई
फिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गई
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ज़िंदगी के जितने दरवाज़े हैं मुझ पे बंद हैं
देखना हद्द-ए-नज़र से आगे बढ़ कर देखना भी जुर्म है
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
मा'शूक़ शाद-ओ-ख़ुर्रम आशिक़ असीर ख़ुश हैं
जितने हैं अब जहाँ में सब ऐ 'नज़ीर' ख़ुश हैं