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नज़्म
ये जुड़ तो सकते हैं लेकिन कहाँ है वो मरहम
जो टूटे रिश्तों को क़ौमों के कर दे फिर बाहम
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
हैं जितने अक़ारिब वो अक़ारिब से हैं बद-तर
अहबाब हैं वो ख़ुद-ग़रज़-ओ-ज़ूद-फ़रामोश
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
सफ़ा-ओ-सिद्क़ के इंसानियत की ख़िदमत के
करम के जूद-ओ-सख़ा के अता के बख़्शिश के