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नज़्म
मुझे इक जुरआ'-ए-आब-ए-सफ़ा दरकार था और मेरे बच्चे ने
सदा दी थी मुझे आओ ख़ुदारा अब तो आ जाओ
वज़ीर आग़ा
नज़्म
अपनी आँख की तपती हुई ख़ाक-ए-सियह में जज़्ब था यकसर
मुझे इक जुरआ-ए-आब सफ़ा दरकार था और मेरे बच्चे ने
वज़ीर आग़ा
नज़्म
मदार-ए-वक़्त से इक जुरआ'-ए-नायाब लेते हैं
यूँही जीते चले जाते हैं बस लम्हों की धड़कन में
फ़ैसल रेहान
नज़्म
सो ज़मीन साया-ए-तीरगी की मिसाल मेरे अक़ब में है
मुझे नींद से जो उठा के जुरआ-ए-आब दे