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नज़्म
आज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँ
दुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हर इक चाँद की अपनी धज थी हर इक चाँद का अपना रूप
लेकिन ऐसा रौशन-रौशन हँसता बातें करता चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
है रश्क-ए-महर ज़र्रा इस मंज़िल-ए-कुहन का
तुलता है बर्ग-ए-गुल से काँटा भी इस चमन का
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
छीन लो इस से भैंसें मेरी और मुँह पर मारो चाँटा
देखो देखो सूख के मेरी भैंसें हुई है काँटा