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नज़्म
बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम हो
बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनी
जिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
न पैदा होगी खत-ए-नस्ख़ से शान-ए-अदब-आगीं
न नस्तालीक़ हर्फ़ इस तौर से ज़ेब-ए-रक़म होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से
क़त’-ए-त'अल्लुक़ हो के इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
हुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारे
इन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' का
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
सैंकड़ों पाँव कटे तब कहीं इक ज़ीना बना
तेरे क़दमों के तले या मिरे क़दमों के तले