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नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हाल
सब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जाल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वो जो हर दीन से मुंकिर था हर इक धर्म से दूर
फिर भी हर दीन हर इक धर्म का ग़म-ख़्वार रहा