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नज़्म
कलमा-ए-हक़ कहा
मक़्तलों क़ैद-ख़ानों सलीबों में बहता लहू उन के होने का ऐलान करता रहा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
अभी कुछ ऐसे ग़य्यूर-ओ-सादिक़ ब-क़ैद-ए-जाँ हैं
कि हर्फ़-ए-इंकार जिन की क़िस्मत नहीं बना है
परवीन शाकिर
नज़्म
लिल्लाहिल-हम्द ब-अनजाम-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ
कलमा-ए-शुक्र ब-नाम-ए-लब-ए-शीरीं-दहनाँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कोई मेरी आँखों में चुभते हुए ज़र्रा-ए-रेग के वास्ते
अपने आँचल का कोना भिगो ले